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Friday, July 31, 2026

क्या पत्नी की सुविधा के आधार पर हर वैवाहिक मुकदमा दूसरे शहर ट्रांसफर हो सकता है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया महत्वपूर्ण फैसला

 

Judicial Samvad | प्रयागराज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में ट्रांसफर याचिकाओं (Transfer Application) पर एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा है कि केवल पत्नी की सुविधा, बच्चे की पढ़ाई या किसी दूसरे शहर में लंबित भरण-पोषण (Maintenance) का मामला, अपने आप में वैवाहिक मुकदमे को दूसरे न्यायालय में स्थानांतरित (Transfer) करने का पर्याप्त आधार नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि Section 24 CPC के तहत ट्रांसफर का अधिकार एक विवेकाधीन (Discretionary) शक्ति है, जिसका प्रयोग केवल तभी किया जाएगा जब वास्तव में न्याय प्रभावित होने, गंभीर कठिनाई (Genuine Hardship) या असाधारण परिस्थितियां (Exceptional Circumstances) साबित हों।




क्या था पूरा मामला?

पत्नी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अनुरोध किया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 (Restitution of Conjugal Rights) के तहत अलीगढ़ फैमिली कोर्ट में लंबित मुकदमे को गौतम बुद्ध नगर फैमिली कोर्ट में स्थानांतरित किया जाए।

पत्नी का कहना था कि—

  • वह वर्तमान में गौतम बुद्ध नगर में अपनी नाबालिग बेटी के साथ रह रही हैं।
  • बेटी वहीं पढ़ाई कर रही है।
  • बार-बार अलीगढ़ आना आर्थिक और शारीरिक रूप से कठिन है।
  • गौतम बुद्ध नगर में पहले से ही भरण-पोषण (Maintenance) का मुकदमा लंबित है, इसलिए दोनों मामलों की सुनवाई एक ही अदालत में होनी चाहिए।

पति ने क्या तर्क दिया?

पति की ओर से कहा गया कि—

  • पत्नी का मायका और ननिहाल दोनों अलीगढ़ में हैं।
  • केवल बेटी की पढ़ाई के कारण मुकदमा ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।
  • पत्नी ट्रांसफर याचिका के माध्यम से केवल मुकदमे में देरी करना चाहती हैं।
  • Section 9 HMA का उद्देश्य परिवार को पुनः साथ लाना है, लेकिन ट्रांसफर याचिका के कारण मूल मुकदमे की सुनवाई ही रुकी हुई है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायालय ने कहा कि—

  • Section 24 CPC का उद्देश्य किसी पक्ष को उसकी पसंद का मंच (Forum) उपलब्ध कराना नहीं बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है।
  • केवल यात्रा की असुविधा या दूसरे शहर में रहना पर्याप्त कारण नहीं है।
  • पत्नी को यह साबित करना होगा कि यदि मुकदमा वर्तमान अदालत में चलता रहा तो उसे वास्तविक और गंभीर कठिनाई होगी तथा न्याय मिलने से वह वंचित हो जाएगी।
  • केवल Maintenance Case का दूसरे शहर में लंबित होना भी ट्रांसफर का स्वतः आधार नहीं बनता।
  • अदालत को दोनों पक्षों की सुविधा, मुकदमे की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्य, मुकदमे की स्थिति तथा न्याय के हित को समग्र रूप से देखना होगा।

कोर्ट की महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी

हाई कोर्ट ने कहा कि—

ट्रांसफर याचिका का उपयोग Forum Shopping के लिए नहीं किया जा सकता।

यदि केवल सुविधा के आधार पर मुकदमे स्थानांतरित किए जाने लगे, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होगी। इसलिए प्रत्येक मामले में वास्तविक कठिनाई और न्याय के हित को प्रमाण सहित सिद्ध करना आवश्यक है।


कोर्ट का अंतिम निर्णय

हाई कोर्ट ने पाया कि पत्नी यह साबित नहीं कर सकीं कि अलीगढ़ में मुकदमे की सुनवाई से उन्हें इतनी गंभीर कठिनाई होगी जिससे न्याय प्रभावित हो।

इसलिए—

  • ट्रांसफर याचिका खारिज कर दी गई।
  • अंतरिम आदेश (Interim Order) समाप्त कर दिया गया।
  • फैमिली कोर्ट, अलीगढ़ को मूल वैवाहिक मुकदमे की सुनवाई शीघ्र पूरी करने का निर्देश दिया गया।

इस फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि—

  • पत्नी की सुविधा एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन एकमात्र आधार नहीं।
  • बच्चे की पढ़ाई या दूसरे शहर में लंबित भरण-पोषण का मामला स्वतः ट्रांसफर का अधिकार नहीं देता।
  • Section 24 CPC के अंतर्गत ट्रांसफर तभी होगा जब वास्तविक कठिनाई और न्याय प्रभावित होने का ठोस प्रमाण हो।
  • अदालतें प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाएंगी।

Case Details

Court: High Court of Judicature at Allahabad

Judge: Hon'ble Dr. Justice Yogendra Kumar Srivastava

Case Title: Smt. Priyanka Maheshwari vs. Vaibhav Maheshwari

Case No.: Transfer Application (Civil) No. 376 of 2025

Decision Date: 30 July 2026

Relevant Provisions:

  • Section 24, Code of Civil Procedure, 1908
  • Section 9, Hindu Marriage Act, 1955
  • Section 144, Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

Result: Transfer Application Dismissed.





Judicial Samvad

क्या आपको लगता है कि केवल पत्नी की सुविधा या बच्चे की पढ़ाई के आधार पर वैवाहिक मुकदमे दूसरे शहर ट्रांसफर होने चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें।

Thursday, July 30, 2026

क्या फोटोकॉपी पर मौजूद हस्ताक्षरों की हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से जांच कराई जा सकती है? इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

 

Judicial Samvad | प्रयागराज

यदि किसी विवादित दस्तावेज़ की केवल फोटोकॉपी उपलब्ध हो, तो क्या उसके हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच (Handwriting Expert Examination) कराई जा सकती है? इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मूल दस्तावेज़ (Original Document) के बिना केवल फोटोकॉपी के आधार पर हस्ताक्षरों की वैज्ञानिक जांच कराना सामान्यतः संभव नहीं है।

न्यायालय ने कहा कि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय तभी विश्वसनीय हो सकती है, जब उसके सामने मूल दस्तावेज़ मौजूद हो। केवल फोटोकॉपी में वे सूक्ष्म विशेषताएं (Microscopic Features) नहीं होतीं, जिनके आधार पर वैज्ञानिक परीक्षण किया जाता है।




क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता का दावा था कि वर्ष 2005 में दुकान के संबंध में एक किरायानामा (Rent Agreement) हुआ था, जिसके आधार पर वह किरायेदार के रूप में दुकान पर कब्जे में है।

बाद में मकान मालिक की ओर से उत्तर प्रदेश शहरी परिसरों की किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के तहत बेदखली (Eviction) का मुकदमा दायर किया गया।

किरायेदार ने अपने बचाव में उस किरायानामे की फोटोकॉपी अदालत में पेश की और मांग की कि उस पर मौजूद हस्ताक्षरों की तुलना मृतक मकान मालिक के स्वीकारित हस्ताक्षरों से हैंडराइटिंग एक्सपर्ट द्वारा कराई जाए।


रेंट अथॉरिटी और रेंट ट्रिब्यूनल ने क्या कहा?

रेंट अथॉरिटी ने आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि—

  • मूल किरायानामा उपलब्ध नहीं है।
  • केवल फोटोकॉपी के आधार पर वैज्ञानिक जांच विश्वसनीय नहीं होगी।
  • इसलिए हैंडराइटिंग एक्सपर्ट को भेजने का कोई औचित्य नहीं है।

रेंट ट्रिब्यूनल ने भी इसी निर्णय को सही माना और अपील खारिज कर दी।


हाई कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों निचली अदालतों के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि—

  • हैंडराइटिंग एक्सपर्ट केवल अक्षरों की आकृति नहीं देखता।
  • वह Pen Pressure, Ink Flow, Stroke Formation, Line Quality, Natural Variations, Pen Lifts जैसी अनेक सूक्ष्म विशेषताओं का परीक्षण करता है।
  • ये सभी विशेषताएं केवल Original Document में सुरक्षित रहती हैं।
  • फोटोकॉपी में ये वैज्ञानिक विशेषताएं नष्ट हो जाती हैं या स्पष्ट नहीं रहतीं।

इसलिए केवल फोटोकॉपी के आधार पर विशेषज्ञ की राय विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती।


अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विरोधी पक्ष ने कुछ तथ्यों को स्वीकार (Admission) भी किया हो, तब भी इससे किसी पक्ष को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि फोटोकॉपी को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा ही जाए।

वैज्ञानिक परीक्षण की पहली और अनिवार्य शर्त मूल दस्तावेज़ का उपलब्ध होना है।


क्या फोटोकॉपी कभी जांच के लिए भेजी जा सकती है?

हाई कोर्ट ने माना कि कुछ विशेष परिस्थितियों में स्पष्ट और उच्च गुणवत्ता वाली फोटोकॉपी पर विशेषज्ञ राय दी जा सकती है, लेकिन यह कोई सामान्य नियम नहीं है।

हर मामले में अदालत यह देखेगी कि उपलब्ध दस्तावेज़ वास्तव में विश्वसनीय वैज्ञानिक परीक्षण के योग्य है या नहीं।


Article 227 पर भी हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि Article 227 के तहत हाई कोर्ट की शक्ति केवल Supervisory Jurisdiction है।

हाई कोर्ट अपील की तरह साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं करता।

जब तक निचली अदालत का आदेश—

  • अधिकार क्षेत्र से बाहर,
  • स्पष्ट रूप से अवैध,
  • मनमाना (Perverse),
  • या न्याय में गंभीर विफलता पैदा करने वाला न हो,

तब तक हाई कोर्ट उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।


कोर्ट का अंतिम फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि—

  • मूल दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है।
  • केवल फोटोकॉपी के आधार पर विशेषज्ञ जांच कराना उचित नहीं।
  • रेंट अथॉरिटी और रेंट ट्रिब्यूनल का आदेश पूरी तरह कानूनी है।

इसलिए याचिका खारिज कर दी गई।


इस फैसले का कानूनी महत्व

✅ केवल फोटोकॉपी के आधार पर हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की जांच का अधिकार नहीं मिलता।

✅ वैज्ञानिक परीक्षण के लिए मूल दस्तावेज़ सबसे महत्वपूर्ण होता है।

✅ विशेषज्ञ की राय केवल सहायक साक्ष्य (Advisory Evidence) होती है, अंतिम निर्णय अदालत का होता है।

✅ Article 227 के तहत हाई कोर्ट केवल गंभीर कानूनी त्रुटियों में ही हस्तक्षेप करेगा।


Case Details

Court: High Court of Judicature at Allahabad

Judge: Hon'ble Dr. Justice Yogendra Kumar Srivastava

Case Title: Udayveer Singh vs. Rent Tribunal and 2 Others

Case No.: Matters Under Article 227 No. 3845 of 2026

Judgment Date: 29 July 2026

Relevant Laws:

  • Article 227, Constitution of India
  • Section 21(2), Uttar Pradesh Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021
  • Section 35, Indian Stamp Act, 1899
  • Section 49, Registration Act, 1908

Final Result: Petition Dismissed.




Discussion Question

क्या आपको लगता है कि यदि मूल दस्तावेज़ उपलब्ध न हो तो केवल फोटोकॉपी के आधार पर फोरेंसिक जांच की अनुमति मिलनी चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें।

Friday, July 24, 2026

क्या एक ही गोद लेने (Adoption Deed) को लेकर अलग-अलग अदालतों में दो मुकदमे चल सकते हैं? इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

 

Judicial Samvad | प्रयागराज

यदि एक ही गोद लेने के दस्तावेज़ (Adoption Deed) को लेकर दो अलग-अलग अदालतों में मुकदमे लंबित हों, तो क्या दोनों मामलों की सुनवाई अलग-अलग अदालतों में जारी रहनी चाहिए?

इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब दो मुकदमे एक ही दस्तावेज़, समान पक्षकारों और लगभग समान कानूनी विवाद से जुड़े हों, तो न्याय के हित में दोनों मामलों की सुनवाई एक ही अदालत में होना अधिक उचित है।

कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से विरोधाभासी फैसलों (Conflicting Judgments) की संभावना समाप्त होती है, न्यायिक समय की बचत होती है और विवाद का प्रभावी एवं समग्र समाधान संभव होता है।




क्या था पूरा मामला?

मामले में 30 जून 2022 को एक पंजीकृत गोद लेने का दस्तावेज़ (Registered Adoption Deed) निष्पादित किया गया, जिसके तहत एक नाबालिग बच्ची को आवेदकों ने विधिवत गोद लिया।

आवेदकों का कहना था कि गोद लेने के बाद से बच्ची उनके परिवार में रह रही है और वे उसकी देखभाल कर रहे हैं।

बाद में जैविक पक्ष (Respondents) ने बच्ची को वापस लेने का दबाव बनाना शुरू किया।

इसी कारण आवेदकों ने कानपुर नगर की अदालत में एक दीवानी वाद दायर किया, जिसमें अदालत से यह घोषणा (Declaration) मांगी गई कि गोद लेने का दस्तावेज़ पूरी तरह वैध और बाध्यकारी (Valid and Binding) है।

इसके बाद प्रतिवादियों ने कन्नौज की अदालत में उसी Adoption Deed को रद्द (Cancellation) कराने के लिए अलग मुकदमा दायर कर दिया।


हाई कोर्ट के सामने क्या सवाल था?

मुख्य प्रश्न यह था कि—

क्या एक ही Adoption Deed को लेकर दो अलग-अलग अदालतों में समान विवाद वाले मुकदमे चलते रहने चाहिए, या फिर दोनों मामलों की सुनवाई एक ही अदालत में होनी चाहिए?


इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने कहा कि—

  • दोनों मुकदमे एक ही Adoption Deed से संबंधित हैं।
  • दोनों में पक्षकार भी लगभग समान हैं।
  • दोनों मामलों में साक्ष्य (Evidence) और कानूनी प्रश्न भी लगभग समान होंगे।
  • यदि दोनों अदालतें अलग-अलग निर्णय दें, तो विरोधाभासी (Conflicting) फैसले आने की संभावना रहेगी।

ऐसी स्थिति न्याय व्यवस्था के हित में नहीं मानी जा सकती।


Section 24 CPC पर कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि Section 24, Code of Civil Procedure के तहत हाई कोर्ट को मुकदमों के ट्रांसफर की शक्ति इसलिए दी गई है ताकि—

  • न्यायिक प्रक्रिया प्रभावी हो,
  • समान विवादों पर अलग-अलग फैसले न आएं,
  • समय और संसाधनों की बचत हो,
  • तथा न्याय का समुचित प्रशासन सुनिश्चित किया जा सके।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रांसफर केवल पक्षकारों की सुविधा के लिए नहीं बल्कि न्याय के व्यापक हित (Ends of Justice) के लिए किया जाता है।


पहले दायर मुकदमे को क्यों दी गई प्राथमिकता?

हाई कोर्ट ने कहा कि सामान्यतः यदि—

  • दो मुकदमे समान विषय पर हों,
  • दोनों सक्षम अदालतों में लंबित हों,

तो जहां पहला मुकदमा पहले से लंबित है, वहीं बाद में दायर मुकदमे को स्थानांतरित करना न्यायसंगत होता है।

इस मामले में भी पहला मुकदमा कानपुर नगर में पहले से लंबित था, इसलिए बाद में दायर कन्नौज का मुकदमा वहीं ट्रांसफर करना उचित माना गया।


विपक्ष ने भी जताई सहमति

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने भी अदालत में कहा कि यदि मुकदमा कन्नौज से कानपुर नगर ट्रांसफर किया जाता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

हालांकि हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ पक्षकारों की सहमति के आधार पर ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।

अदालत को स्वयं यह संतुष्ट होना आवश्यक है कि ट्रांसफर वास्तव में न्याय के हित में है।


हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रांसफर आवेदन स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि—

  • कन्नौज की अदालत में लंबित O.S. No. 170 of 2023 को कानपुर नगर की सक्षम अदालत में ट्रांसफर किया जाए।
  • कन्नौज की अदालत 15 दिनों के भीतर पूरा रिकॉर्ड कानपुर नगर भेजे।
  • कानपुर नगर की अदालत आवश्यकतानुसार दोनों मुकदमों की संयुक्त सुनवाई (Joint Hearing) या कानून के अनुसार उपयुक्त प्रक्रिया अपनाने पर विचार करेगी ताकि विरोधाभासी निर्णयों से बचा जा सके।

इस फैसले का कानूनी महत्व

✅ समान दस्तावेज़ और समान विवाद वाले मुकदमों की सुनवाई एक ही अदालत में होना न्याय के हित में है।

✅ Section 24 CPC का उद्देश्य केवल सुविधा नहीं बल्कि Effective Administration of Justice है।

✅ अलग-अलग अदालतों से विरोधाभासी फैसले आने से बचाना भी ट्रांसफर का महत्वपूर्ण आधार है।

✅ पहले दायर मुकदमे वाली अदालत को सामान्यतः प्राथमिकता दी जाएगी।


Case Details

Court: High Court of Judicature at Allahabad

Judge: Hon'ble Dr. Justice Yogendra Kumar Srivastava

Case Title: Preeti Mishra & Another vs. Vishnu Kant Tripathi & Another

Case No.: Transfer Application (Civil) No. 900 of 2023

Judgment Date: 23 July 2026

Relevant Provision: Section 24, Code of Civil Procedure, 1908

Final Decision: Transfer Application Allowed. कन्नौज में लंबित वाद को कानपुर नगर की सक्षम अदालत में ट्रांसफर करने का आदेश।




Discussion Question

क्या एक ही दस्तावेज़ और समान विवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई हमेशा एक ही अदालत में होनी चाहिए ताकि विरोधाभासी फैसलों से बचा जा सके? अपनी राय कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें।

Friday, July 17, 2026

क्या बेदखली (Eviction) के मुकदमे में कोई तीसरा व्यक्ति मालिकाना हक का दावा करके पक्षकार बन सकता है? इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

 

Judicial Samvad | प्रयागराज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मकान मालिक-किरायेदार विवादों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किरायेदारी विवाद (Rent Proceedings) में कोई तीसरा व्यक्ति केवल इस आधार पर पक्षकार (Impleadment) नहीं बन सकता कि वह संपत्ति पर अपना मालिकाना हक (Ownership/Title) होने का दावा करता है।

कोर्ट ने कहा कि U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021 के तहत चलने वाली बेदखली की कार्यवाही केवल मकान मालिक और किरायेदार के बीच के विवाद के निस्तारण के लिए होती है। इन कार्यवाहियों में संपत्ति के स्वामित्व (Title) से जुड़े जटिल विवादों का निर्णय नहीं किया जा सकता।




क्या था पूरा मामला?

मामले में मकान मालिक ने Section 21(2), U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021 के तहत किरायेदार के खिलाफ बेदखली (Eviction) का मामला दायर किया था।

सुनवाई के दौरान एक तीसरे व्यक्ति ने Order I Rule 10 CPC के तहत आवेदन देकर स्वयं को मुकदमे में पक्षकार बनाने की मांग की।

उसका दावा था कि संबंधित संपत्ति पर वास्तविक मालिकाना हक उसी का है और इसलिए उसे भी मुकदमे में सुना जाना चाहिए।


रेंट अथॉरिटी और रेंट ट्रिब्यूनल का फैसला

पहले Rent Authority ने तीसरे व्यक्ति का आवेदन स्वीकार कर उसे पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी।

लेकिन बाद में Rent Tribunal ने इस आदेश को पलटते हुए कहा कि—

  • यह मुकदमा केवल मकान मालिक और किरायेदार के अधिकारों से संबंधित है।
  • तीसरे व्यक्ति का मालिकाना हक का दावा इस कार्यवाही के दायरे से बाहर है।
  • इसलिए उसे पक्षकार नहीं बनाया जा सकता।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने रेंट ट्रिब्यूनल के निर्णय को सही ठहराते हुए कहा कि—

Section 21 के तहत चलने वाली कार्यवाही का उद्देश्य केवल यह तय करना है कि—

  • मकान मालिक और किरायेदार के बीच कानूनी संबंध (Landlord-Tenant Relationship) है या नहीं।
  • बेदखली के लिए कानून में निर्धारित आधार मौजूद हैं या नहीं।

इन कार्यवाहियों में स्वामित्व (Ownership) या टाइटल (Title) जैसे जटिल प्रश्नों पर फैसला नहीं किया जा सकता।


कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

हाई कोर्ट ने कहा—

जो व्यक्ति मकान मालिक के विरुद्ध स्वतंत्र मालिकाना हक (Independent Title) का दावा करता है, वह केवल उस दावे के आधार पर किरायेदारी विवाद में पक्षकार बनने का अधिकार नहीं रखता।

यदि ऐसे दावों को Rent Authority में सुनने की अनुमति दी जाए, तो किरायेदारी विवाद अनावश्यक रूप से जटिल हो जाएंगे और कानून द्वारा निर्धारित त्वरित (Summary) प्रक्रिया का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।


यदि तीसरा व्यक्ति मालिकाना हक का दावा करता है तो क्या करे?

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

यदि कोई व्यक्ति यह कहता है कि संपत्ति वास्तव में उसकी है, तो उसके लिए उचित मंच सिविल कोर्ट (Civil Court) है।

वह वहां स्वतंत्र दीवानी वाद (Civil Suit) दायर कर अपने अधिकारों का निर्णय करा सकता है।

लेकिन Rent Authority के समक्ष चल रही बेदखली कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।


Article 227 पर हाई कोर्ट की टिप्पणी

हाई कोर्ट ने कहा कि—

Article 227 के तहत उसका अधिकार केवल यह देखने तक सीमित है कि अधीनस्थ न्यायालय या ट्रिब्यूनल ने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर कार्य किया है या नहीं।

जब तक आदेश—

  • अधिकार क्षेत्र से बाहर,
  • स्पष्ट रूप से अवैध,
  • मनमाना,
  • या न्याय में गंभीर विफलता उत्पन्न करने वाला न हो,

तब तक हाई कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा।


कोर्ट का अंतिम फैसला

हाई कोर्ट ने कहा कि—

  • रेंट ट्रिब्यूनल का आदेश पूरी तरह कानून के अनुरूप है।
  • तीसरे व्यक्ति का मालिकाना हक का दावा Rent Proceedings में नहीं सुना जा सकता।
  • उसके लिए अलग से सिविल कोर्ट का रास्ता उपलब्ध है।

इसलिए याचिका खारिज कर दी गई।


इस फैसले का कानूनी महत्व

✅ Rent Authority केवल मकान मालिक और किरायेदार के विवाद का निर्णय करेगी।

✅ स्वामित्व (Title) और मालिकाना हक के विवाद Civil Court में तय होंगे।

✅ तीसरा व्यक्ति केवल मालिकाना दावा करके Eviction Case में पक्षकार नहीं बन सकता।

✅ Order I Rule 10 CPC का उपयोग करके Rent Proceedings का दायरा नहीं बढ़ाया जा सकता।

✅ U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021 का उद्देश्य किरायेदारी विवादों का त्वरित और प्रभावी निस्तारण है।


Case Details

Court: High Court of Judicature at Allahabad

Judge: Hon'ble Dr. Justice Yogendra Kumar Srivastava

Case Title: Murti Markandeshwar Ji Maharaj Gopal Ki Bagiya City Jhansi vs. Smt. Jyoti Gangwani & Another

Case No.: Matters Under Article 227 No. 7436 of 2026

Judgment Date: 15 July 2026

Relevant Provisions:

  • Article 227, Constitution of India
  • Section 21(2), U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021
  • Order I Rule 10, Code of Civil Procedure, 1908

Final Decision: याचिका खारिज। हाई कोर्ट ने माना कि तीसरा व्यक्ति स्वतंत्र मालिकाना हक का दावा करते हुए Rent Proceedings में पक्षकार नहीं बन सकता।





Discussion Question

क्या आपको लगता है कि यदि कोई व्यक्ति संपत्ति पर अपना मालिकाना हक होने का दावा करता है, तो उसे किरायेदारी विवाद में पक्षकार बनने की अनुमति मिलनी चाहिए, या उसे अलग से सिविल कोर्ट में ही अपना दावा करना चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें।

क्या 2021 के बाद मकान मालिक-किरायेदार के विवाद Small Causes Court में चल सकते हैं? इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

 

Judicial Samvad | प्रयागराज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मकान मालिक और किरायेदार (Landlord-Tenant) विवादों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई किरायेदारी विवाद उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 (U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021) लागू होने के बाद दायर किया गया है, तो उसकी सुनवाई सामान्यतः Small Causes Court (SCC Court) में नहीं बल्कि 2021 के अधिनियम के तहत गठित Rent Authority के समक्ष होगी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि मकान मालिक ने पहले Transfer of Property Act की धारा 106 के तहत नोटिस भेज दिया था, Small Causes Court का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) सुरक्षित नहीं रह जाता।




क्या था पूरा मामला?

हापुड़ स्थित दो दुकानों के संबंध में मकान मालिक ने किरायेदार को 15 जुलाई 2021 को धारा 106, Transfer of Property Act, 1882 के तहत किरायेदारी समाप्त करने का नोटिस भेजा।

इसके बाद 20 अगस्त 2021 को मकान मालिक ने किरायेदार के खिलाफ Small Causes Court, हापुड़ में बेदखली (Eviction), किराया बकाया और हर्जाना वसूलने का मुकदमा दायर किया।

मुकदमे के दौरान किरायेदार की मृत्यु हो गई और उसके कानूनी उत्तराधिकारियों (Legal Representatives) को पक्षकार बनाया गया।

उत्तराधिकारियों ने अदालत में आपत्ति उठाई कि—

  • जब मुकदमा दायर हुआ, तब तक U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021 लागू हो चुका था।
  • इसलिए इस विवाद की सुनवाई Small Causes Court नहीं बल्कि Rent Authority के समक्ष होनी चाहिए थी।

निचली अदालत ने क्या कहा?

Small Causes Court ने यह कहते हुए आपत्ति खारिज कर दी कि—

  • किरायेदारी पहले ही धारा 106 TPA के नोटिस से समाप्त हो चुकी थी।
  • इसलिए मुकदमा Small Causes Court में ही चल सकता है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत के इस दृष्टिकोण को कानूनी रूप से गलत बताया।

कोर्ट ने कहा कि—

किसी अदालत का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) यह देखकर तय होगा कि मुकदमा किस तारीख को दायर किया गया, न कि यह देखकर कि नोटिस कब भेजा गया था।

यदि मुकदमा 2021 के अधिनियम के लागू होने के बाद दायर हुआ है, और वह अधिनियम उस विवाद पर लागू होता है, तो मामला Rent Authority के समक्ष ही जाएगा।


धारा 106 TPA पर कोर्ट की अहम टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि—

Transfer of Property Act की धारा 106 केवल किरायेदारी समाप्त करने का कारण (Cause of Action) देती है।

लेकिन यह तय नहीं करती कि मुकदमे की सुनवाई किस अदालत में होगी।

यानी—

✔️ नोटिस देना एक अलग बात है।

✔️ मुकदमा किस अदालत में चलेगा, यह उस समय लागू कानून से तय होगा जब मुकदमा दायर किया गया।


Section 38, 2021 Act का क्या महत्व है?

हाई कोर्ट ने कहा कि Section 38(1) स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था करता है कि—

जहां 2021 का अधिनियम लागू होता है, वहां उससे संबंधित विवादों की सुनवाई विशेष रूप से Rent Authority करेगी।

ऐसी स्थिति में सामान्य दीवानी अदालतों तथा Small Causes Court का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है।


कोर्ट ने क्यों पलटा निचली अदालत का फैसला?

हाई कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने—

  • Jurisdiction और Cause of Action में अंतर नहीं समझा।
  • केवल धारा 106 TPA के नोटिस को आधार बनाकर मुकदमे को SCC Court में चलने योग्य मान लिया।
  • जबकि 2021 के नए कानून के लागू होने के बाद मंच (Forum) बदल चुका था।

इसलिए निचली अदालत का आदेश कानून के विपरीत था।


क्या मकान मालिक का दावा खत्म हो गया?

नहीं।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

मकान मालिक का अधिकार समाप्त नहीं हुआ है।

उन्हें स्वतंत्रता दी गई है कि वे U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021 के तहत सक्षम Rent Authority के समक्ष नया वाद दायर कर सकते हैं।


हाई कोर्ट का अंतिम फैसला

✔️ दोनों Revision स्वीकार कर ली गईं।

✔️ Small Causes Court, हापुड़ के आदेश रद्द कर दिए गए।

✔️ घोषित किया गया कि SCC Suit No. 3 of 2021 Small Causes Court में विचारणीय (Maintainable) नहीं है।

✔️ मकान मालिक को Rent Authority के समक्ष नया मामला दायर करने की स्वतंत्रता दी गई।


इस फैसले का कानूनी महत्व

✅ 2021 के बाद दायर किरायेदारी विवादों में अधिकार क्षेत्र नए Tenancy Act से तय होगा।

✅ धारा 106 TPA का नोटिस केवल Cause of Action देता है, Jurisdiction तय नहीं करता।

✅ Section 38, U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021 Rent Authority को विशेष अधिकार देता है।

✅ गलत मंच (Wrong Forum) में दायर मुकदमा आगे नहीं चल सकता।


Case Details

Court: High Court of Judicature at Allahabad

Judge: Hon'ble Dr. Justice Yogendra Kumar Srivastava

Case Titles:

  • Manoharlal (Deceased) & Others vs. Jagdish Prasad Goel (S.C.C. Revision No. 79 of 2025)
  • Manoharlal (Deceased) & Others vs. Jagdish Prasad Goel (S.C.C. Revision No. 51 of 2026)

Judgment Date: 15 July 2026

Relevant Laws:

  • Uttar Pradesh Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021
  • Section 38, U.P. Tenancy Act, 2021
  • Section 106, Transfer of Property Act, 1882
  • Order VII Rule 11, Code of Civil Procedure

Final Decision: दोनों SCC Revisions स्वीकार। Small Causes Court का अधिकार क्षेत्र समाप्त माना गया तथा मकान मालिक को Rent Authority के समक्ष उचित कार्यवाही करने की स्वतंत्रता दी गई।




Discussion Question

क्या आपको लगता है कि नए किरायेदारी कानून लागू होने के बाद सभी मकान मालिक-किरायेदार विवाद केवल Rent Authority के समक्ष ही सुने जाने चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें।

Sunday, May 17, 2026

Rajnesh v. Neha के नियम औपचारिकता नहीं, आय छिपाने वाले पति पर तल्ख हुआ इलाहाबाद हाईकोर्ट; निचली अदालतों को दिए सख्त निर्देश

 

मुख्य बातें (Highlights):

  • दिशानिर्देशों का उल्लंघन: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण (Maintenance) मामलों में संपत्ति और देनदारियों का प्रकटीकरण हलफनामा केवल कागजी खानापूर्ति नहीं है।

  • ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य: न्यायालय ने कहा कि निचली अदालतों को पक्षों के पिछले 3 साल के बैंक स्टेटमेंट और वित्तीय दस्तावेज अनिवार्य रूप से रिकॉर्ड पर लेने चाहिए।

  • सख्त रुख: वास्तविक आय को जानबूझकर छिपाना न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास है, ऐसे मामलों में अदालतों को सतर्क रहकर कड़ी कार्रवाई करनी होगी।

पूरा मामला और कानूनी विवाद

यह मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष क्रिमिनल रिवीजन याचिकाओं (Criminal Revision No. 223 of 2024 व संबद्ध Criminal Revision No. 51 of 2024) के माध्यम से आया था। इस मामले में सीआरपीसी की धारा 125 (Section 125 CrPC) के तहत तय की गई भरण-पोषण की राशि को चुनौती दी गई थी।

मामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पति ने अपनी वास्तविक आय और वित्तीय स्थिति को छुपाने के लिए जानबूझकर अपने बैंक स्टेटमेंट, आयकर रिटर्न (ITR) और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश नहीं किए थे और एक भ्रामक हलफनामा दायर किया था।



इलाहाबाद हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या

माननीय न्यायमूर्ति ने इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Rajnesh v. Neha (2021) के ऐतिहासिक फैसले में तय किए गए सिद्धांतों को दोहराते हुए निचली अदालतों की कार्यप्रणाली और पक्षकारों के रवैये पर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:

1. 'Rajnesh v. Neha' के निर्देश मात्र औपचारिकता नहीं

हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए दिशानिर्देश और उनके तहत मांगा जाने वाला 'संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा' (Affidavit of Disclosure of Assets and Liabilities) कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है कि इसे जैसे-तैसे भर कर दे दिया जाए। इसका उद्देश्य कोर्ट के सामने दोनों पक्षों की वास्तविक वित्तीय स्थिति को स्पष्ट रूप से लाना है।

2. पिछले 3 वर्षों के बैंक स्टेटमेंट मंगाना ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य

अदालत ने स्पष्ट रूप से अभिलिखित किया कि यह ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) का वैधानिक कर्तव्य है कि वह केवल हलफनामे पर भरोसा न करे, बल्कि सच्चाई का पता लगाने के लिए दोनों पक्षों से पिछले तीन वर्षों के बैंक स्टेटमेंट, वित्तीय रिकॉर्ड और अन्य आवश्यक दस्तावेज अनिवार्य रूप से रिकॉर्ड पर प्रस्तुत कराए।

3. आय छिपाना न्यायालय को भ्रमित करने का प्रयास

माननीय न्यायालय ने कहा कि आवश्यक वित्तीय दस्तावेजों का जानबूझकर प्रकटीकरण (Non-disclosure) न करना सीधे तौर पर न्यायालय को गुमराह और भ्रमित करने का एक दुर्भावनापूर्ण प्रयास है। ऐसे मामलों में अदालतों को मूकदर्शक नहीं बने रहना चाहिए।

4. अदालतों को सतर्क रहने और सख्त कदम उठाने की जरूरत

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि कोई पक्षकार गलत हलफनामा देता है या जानबूझकर तथ्य छुपाता है, तो न्यायालयों को पूरी तरह सतर्क (Vigilant) रहना चाहिए। अदालतें ऐसे मामलों में साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 (Section 106 Evidence Act) के तहत प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकती हैं और आईपीसी की धारा 191/193 (झूठे साक्ष्य देना) के तहत दंडात्मक कार्रवाई भी सुनिश्चित कर सकती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय भरण-पोषण के मुकदमों में अपनी आय छुपाने वाले पतियों के लिए एक बड़ा झटका है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब केवल सैलरी स्लिप छुपाकर या कम आय दिखाकर गुजारा भत्ता से नहीं बचा जा सकता। इस आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों को भी भेजी गई है ताकि पूरे राज्य में Rajnesh v. Neha के नियमों का कड़ाई से पालन हो सके।

केस विवरण (Case Details)

  • केस का नाम: Smt Sadhana @ Shakshi And Another vs State Of U.P. And Another

  • न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (High Court of Judicature at Allahabad)

  • क्रिमिनल रिवीजन नंबर: Criminal Revision No. - 223 of 2024 (With Criminal Revision No. 51 of 2024)

  • फैसले की तारीख: 15 मई, 2026

  • न्यूट्रल सिटेशन नंबर: 2026:AHC:115457

  • श्रेणी: A.F.R. (Approved for Reporting)

  • याचिकाकर्ता के वकील: एस.पी.एस. चौहान, श्रीमती मीनाक्षी चौहान

  • विपक्षी दल के वकील: अभिनव सिंह, जी.ए., संतोष कुमार उपाध्याय, विनोद कुमार उपाध्याय



⚖️ आप क्या सोचते हैं? क्या गुजारा भत्ता तय करते समय पिछले 3 साल के बैंक स्टेटमेंट और ITR को अनिवार्य करना एक ऐतिहासिक और सही कदम है? क्या इससे अदालतों को गुमराह करने वालों पर लगाम लगेगी?


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