भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नाथू उर्फ जगदीश बनाम उत्तराखंड राज्य (25 जून, 2026) के मामले में एक बेहद व्यावहारिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए 29 साल पुराने आपराधिक मामले में सजा को कम कर दिया है
⌚ 500 रूपये की पुरानी घड़ी और वह खौफनाक रात (The Tragic Incident)
मामले की शुरुआत: यह घटना 12 फरवरी 1997 की रात देहरादून (उत्तराखंड) में हुई थी
। मृतक पदम सिंह ने मुख्य आरोपी (मनुआ) को 500 रुपये में एक कलाई घड़ी बेची थी । झगड़े की वजह: मनुआ को घड़ी पसंद नहीं आई और वह उसे वापस करने पदम सिंह के घर गया
। बातों ही बातों में बहस इतनी बढ़ गई कि मनुआ के साथ रामू और वर्तमान जीवित अपीलकर्ता नाथू उर्फ जगदीश भी शामिल हो गए । नहर में धक्का: तीनों आरोपियों ने हाथापाई के दौरान पदम सिंह को एक सूखी और पथरीली नहर में धक्का दे दिया
। सिर और चेहरे पर गंभीर चोटें आने के कारण अस्पताल में पदम सिंह की मृत्यु हो गई ।
🏛️ ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर (Legal Journey)
निचली अदालत का फैसला (2002): देहरादून की सेशन्स कोर्ट ने तीनों आरोपियों को गैर-इरादतन हत्या (धारा 304/34 IPC) का दोषी पाते हुए 5-5 साल के कड़े कारावास की सजा सुनाई थी
। हाईकोर्ट की मुहर (2012): उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उनकी सजा को बरकरार रखा
। इसके बाद आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां उन्हें दिसंबर 2012 में जमानत मिल गई । अपील का उपशमन (Abatement): सुप्रीम कोर्ट में लंबी पेंडेंसी के दौरान, तीन में से दो आरोपी (मनुआ और रामू) दम तोड़ गए, जिसके बाद यह कानूनी लड़ाई केवल तीसरे आरोपी नाथू उर्फ जगदीश तक सीमित रह गई
।
🔍 सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 3 बड़ी बातें (Key Takeaways)
1. फॉरेन्सिक रिपोर्ट की अनुपस्थिति और चोटों का कारण:
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि नाथू ने पदम सिंह के सिर पर भारी पत्थर से वार किया था
2. धारा 304 का पार्ट-II (Section 304 Part II) लागू होना:
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आरोपियों का इरादा पदम सिंह की जान लेना (Intention to Cause Death) नहीं था
3. समय की मार और "जितनी सजा काटी, वही काफी" (Period Already Undergone):
माननीय न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने बेहद मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा
"यह घटना 1997 में हुई थी जब अपीलकर्ता 33 वर्ष का था। आज 2026 में लगभग तीन दशक बीत चुके हैं और उसकी उम्र 60 वर्ष से अधिक हो चुकी है। वह पहले ही डेढ़ साल से अधिक का समय जेल में काट चुका है। समय के इस लंबे फासले को देखते हुए, न्याय का तकाजा यही कहता है कि उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा को अब तक काटी गई अवधि तक ही सीमित कर दिया जाए।"
📋 केस विवरण (Case Details)
केस का नाम: नाथू उर्फ जगदीश बनाम उत्तराखंड राज्य (Mathu Alias Jagdish V. State of Uttarakhand)
केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 2024 / 2012
न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
साइटेशन: 2026 INSC 658
पीठ (Bench): माननीय न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और माननीय न्यायमूर्ति अरुण पल्ली
निर्णय तिथि: 25 जून, 2026
फैसला: दोषसिद्धि बरकरार, लेकिन 5 साल की सजा को घटाकर 'पहले से काटी गई अवधि' (Over 1.5 Years) में बदला गया
।
पाठकों के चर्चा के लिए सवाल (Discussion Question)
"क्या भारत की न्याय व्यवस्था में किसी आपराधिक अपील के फैसले में 25-30 साल की देरी होना न्याय के सिद्धांतों का मजाक है? क्या ढलती उम्र और लंबी कानूनी लड़ाई को आधार बनाकर सजा कम करना सर्वोच्च न्यायालय का एक सराहनीय मानवीय कदम है, या फिर पीड़ित परिवार के सामाजिक न्याय के साथ यह एक समझौता है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।"
No comments:
Post a Comment