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Friday, October 31, 2025

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गवाहों को धमकाने (Section 195A IPC) के मामले में FIR दर्ज करना पूरी तरह वैध, कोर्ट की लिखित शिकायत ज़रूरी नहीं!

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों की सुरक्षा और आपराधिक न्याय प्रणाली को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी गवाह को झूठी गवाही देने के लिए डराया या धमकाया जाता है, तो पुलिस सीधे FIR दर्ज कर जांच शुरू कर सकती है। ऐसे मामलों में अदालत की लिखित शिकायत (Written Complaint) का इंतज़ार करना ज़रूरी नहीं है।




यह ऐतिहासिक फैसला जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने 'केरल राज्य बनाम सुनी @ सुनील' (State of Kerala vs Suni @ Sunil, 2025 INSC 1260) मामले में सुनाया है।

मुख्य कानूनी विवाद क्या था? (What was the Dispute?)

दरअसल, कानूनी गलियारों में लंबे समय से इस बात को लेकर असमंजस था कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 195A (गवाह को झूठी गवाही के लिए धमकाना) के तहत कार्रवाई कैसे हो?

  • असमंजस: केरल और कर्नाटक हाई कोर्ट सहित कुछ अदालतों का मानना था कि चूंकि यह अपराध 'न्याय के खिलाफ' है, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 195(1)(b)(i) के तहत इसमें केवल संबंधित कोर्ट ही लिखित शिकायत दर्ज करा सकता है, पुलिस सीधे FIR नहीं कर सकती।

  • असर: इस तकनीकी कारण की वजह से कई आरोपी पुलिस की FIR को चुनौती देकर बच निकल रहे थे या उन्हें जमानत मिल जा रही थी।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और फैसला (SC's Key Observations)

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट्स के पुराने फैसलों को खारिज करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:

  1. यह एक संज्ञेय (Cognizable) अपराध है: अदालत ने कहा कि जब साल 2006 में कानून में संशोधन कर धारा 195A जोड़ी गई थी, तब इसे विशेष रूप से 'संज्ञेय अपराध' (जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है) की श्रेणी में रखा गया था।

  2. गवाह को तुरंत सुरक्षा की ज़रूरत होती है: सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक रुख अपनाते हुए कहा, "गवाह को कोर्ट में आने से बहुत पहले ही धमकाया जा सकता है। अगर उसे कोर्ट जाकर शिकायत करने और धारा 340 की लंबी प्रक्रिया का पालन करने के लिए मजबूर किया जाएगा, तो न्याय की पूरी प्रक्रिया ही पंगु (Crippled) हो जाएगी।"

  3. CrPC की धारा 195A एक अतिरिक्त उपाय है: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2009 में जोड़ी गई CrPC की धारा 195A गवाह को सीधे मजिस्ट्रेट के पास शिकायत करने का अतिरिक्त अधिकार (Additional Remedy) देती है, न कि पुलिस के FIR दर्ज करने के अधिकार को छीनती है।

"धारा 195A IPC एक गंभीर और संज्ञेय अपराध है। पुलिस के पास धारा 154 और 156 CrPC के तहत सीधे जानकारी मिलने पर FIR दर्ज करने और जांच करने का पूरा अधिकार है।" — सुप्रीम कोर्ट (जजमेंट पैरा 29)

हाई कोर्ट के फैसले पलटे, आरोपियों को झटका

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बड़ा एक्शन लेते हुए:

  • केरल हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसने आरोपी 'सुनी @ सुनील' को केवल प्रक्रियात्मक कमी के आधार पर जमानत दी थी। कोर्ट ने आरोपी को दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया।

  • कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा प्रसिद्ध 'योगेश गौड़ा हत्याकांड' के गवाहों को धमकाने वाले आरोपियों को डिस्चार्ज करने और कॉग्निजेंस ऑर्डर को रद्द करने के फैसले को भी पूरी तरह पलट दिया।

केस की पूरी जानकारी (Case Details):

  • केस नाम: State of Kerala vs Suni @ Sunil (WITH CBI Appeals)

  • साइटेशन (Citation): 2025 INSC 1260

  • तारीख (Judgment Date): 28 अक्टूबर, 2025

  • पीठ (Bench): जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे



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