क्या राज्य सरकार किसी जांच एजेंसी को केवल एक नोटिफिकेशन जारी करके सूचना के अधिकार (RTI) कानून के दायरे से बाहर रख सकती है? इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक स्पष्ट और कठोर रुख अपनाते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
क्या था मामला?
मामला मध्य प्रदेश का है। एक पूर्व टाउन इंस्पेक्टर, जिन्हें भ्रष्टाचार के एक मामले (ट्रैप केस) में आरोपी बनाया गया था, ने RTI के तहत अपनी जांच और अभियोजन (prosecution) की मंजूरी से जुड़ी जानकारी मांगी थी।
राज्य के Special Police Establishment (SPE) ने यह जानकारी देने से इनकार कर दिया। SPE का तर्क था कि 25 अगस्त 2011 के एक सरकारी नोटिफिकेशन के तहत, RTI कानून की धारा 24(4) का उपयोग करते हुए SPE को RTI के दायरे से छूट प्राप्त है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल सरकार द्वारा 'नोटिफिकेशन' जारी कर देने मात्र से कोई संस्था 'इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी' (Intelligence and Security) संस्था नहीं बन जाती।
कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:
परिभाषा का महत्व: RTI कानून की धारा 24(4) केवल उन संस्थाओं को छूट देती है जो 'इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी' से जुड़ी हैं। SPE का काम केवल भ्रष्टाचार और कुछ विशिष्ट आपराधिक मामलों की जांच करना है, न कि खुफिया या राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित काम करना।
नोटिफिकेशन रद्द: कोर्ट ने 25 अगस्त 2011 के उस नोटिफिकेशन को 'कानून की दृष्टि से गलत' (bad in law) करार देते हुए रद्द कर दिया, जिसके तहत SPE को RTI के दायरे से बाहर रखा गया था।
संवैधानिक जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा कि RTI कानून नागरिकों का एक मूलभूत अधिकार है और इसे किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा मनमाने ढंग से सीमित नहीं किया जा सकता।
नतीजा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SPE को RTI कानून का पालन करना होगा और याचिकाकर्ता को मांगी गई जानकारी देनी होगी। (नोट: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल SPE के लिए है; राज्य की 'आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो' पर इसकी प्रभावशीलता की जांच नहीं की गई है)।
केस का विवरण (Case Details)
मामला: Special Police Establishment बनाम कामता प्रसाद मिश्रा
निर्णय की तिथि: 15 जून, 2026
न्यायाधीश: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर
मुख्य मुद्दा: RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत राज्य सरकार की अधिसूचना की वैधता और 'इंटेलिजेंस एवं सिक्योरिटी' संस्थाओं की परिभाषा।
असर: अब भ्रष्टाचार विरोधी जांच एजेंसियां स्वयं को बिना ठोस आधार के RTI के दायरे से बाहर नहीं बता सकतीं।
पाठकों के लिए सवाल:
क्या आपको लगता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में शामिल जांच एजेंसियों को पूरी तरह से RTI के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए, या पारदर्शिता के लिए उन्हें सूचना देने के लिए बाध्य होना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर बताएं।
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