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Thursday, July 30, 2026

क्या फोटोकॉपी पर मौजूद हस्ताक्षरों की हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से जांच कराई जा सकती है? इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

 

Judicial Samvad | प्रयागराज

यदि किसी विवादित दस्तावेज़ की केवल फोटोकॉपी उपलब्ध हो, तो क्या उसके हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच (Handwriting Expert Examination) कराई जा सकती है? इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मूल दस्तावेज़ (Original Document) के बिना केवल फोटोकॉपी के आधार पर हस्ताक्षरों की वैज्ञानिक जांच कराना सामान्यतः संभव नहीं है।

न्यायालय ने कहा कि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय तभी विश्वसनीय हो सकती है, जब उसके सामने मूल दस्तावेज़ मौजूद हो। केवल फोटोकॉपी में वे सूक्ष्म विशेषताएं (Microscopic Features) नहीं होतीं, जिनके आधार पर वैज्ञानिक परीक्षण किया जाता है।




क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता का दावा था कि वर्ष 2005 में दुकान के संबंध में एक किरायानामा (Rent Agreement) हुआ था, जिसके आधार पर वह किरायेदार के रूप में दुकान पर कब्जे में है।

बाद में मकान मालिक की ओर से उत्तर प्रदेश शहरी परिसरों की किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के तहत बेदखली (Eviction) का मुकदमा दायर किया गया।

किरायेदार ने अपने बचाव में उस किरायानामे की फोटोकॉपी अदालत में पेश की और मांग की कि उस पर मौजूद हस्ताक्षरों की तुलना मृतक मकान मालिक के स्वीकारित हस्ताक्षरों से हैंडराइटिंग एक्सपर्ट द्वारा कराई जाए।


रेंट अथॉरिटी और रेंट ट्रिब्यूनल ने क्या कहा?

रेंट अथॉरिटी ने आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि—

  • मूल किरायानामा उपलब्ध नहीं है।
  • केवल फोटोकॉपी के आधार पर वैज्ञानिक जांच विश्वसनीय नहीं होगी।
  • इसलिए हैंडराइटिंग एक्सपर्ट को भेजने का कोई औचित्य नहीं है।

रेंट ट्रिब्यूनल ने भी इसी निर्णय को सही माना और अपील खारिज कर दी।


हाई कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों निचली अदालतों के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि—

  • हैंडराइटिंग एक्सपर्ट केवल अक्षरों की आकृति नहीं देखता।
  • वह Pen Pressure, Ink Flow, Stroke Formation, Line Quality, Natural Variations, Pen Lifts जैसी अनेक सूक्ष्म विशेषताओं का परीक्षण करता है।
  • ये सभी विशेषताएं केवल Original Document में सुरक्षित रहती हैं।
  • फोटोकॉपी में ये वैज्ञानिक विशेषताएं नष्ट हो जाती हैं या स्पष्ट नहीं रहतीं।

इसलिए केवल फोटोकॉपी के आधार पर विशेषज्ञ की राय विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती।


अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विरोधी पक्ष ने कुछ तथ्यों को स्वीकार (Admission) भी किया हो, तब भी इससे किसी पक्ष को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि फोटोकॉपी को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा ही जाए।

वैज्ञानिक परीक्षण की पहली और अनिवार्य शर्त मूल दस्तावेज़ का उपलब्ध होना है।


क्या फोटोकॉपी कभी जांच के लिए भेजी जा सकती है?

हाई कोर्ट ने माना कि कुछ विशेष परिस्थितियों में स्पष्ट और उच्च गुणवत्ता वाली फोटोकॉपी पर विशेषज्ञ राय दी जा सकती है, लेकिन यह कोई सामान्य नियम नहीं है।

हर मामले में अदालत यह देखेगी कि उपलब्ध दस्तावेज़ वास्तव में विश्वसनीय वैज्ञानिक परीक्षण के योग्य है या नहीं।


Article 227 पर भी हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि Article 227 के तहत हाई कोर्ट की शक्ति केवल Supervisory Jurisdiction है।

हाई कोर्ट अपील की तरह साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं करता।

जब तक निचली अदालत का आदेश—

  • अधिकार क्षेत्र से बाहर,
  • स्पष्ट रूप से अवैध,
  • मनमाना (Perverse),
  • या न्याय में गंभीर विफलता पैदा करने वाला न हो,

तब तक हाई कोर्ट उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।


कोर्ट का अंतिम फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि—

  • मूल दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है।
  • केवल फोटोकॉपी के आधार पर विशेषज्ञ जांच कराना उचित नहीं।
  • रेंट अथॉरिटी और रेंट ट्रिब्यूनल का आदेश पूरी तरह कानूनी है।

इसलिए याचिका खारिज कर दी गई।


इस फैसले का कानूनी महत्व

✅ केवल फोटोकॉपी के आधार पर हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की जांच का अधिकार नहीं मिलता।

✅ वैज्ञानिक परीक्षण के लिए मूल दस्तावेज़ सबसे महत्वपूर्ण होता है।

✅ विशेषज्ञ की राय केवल सहायक साक्ष्य (Advisory Evidence) होती है, अंतिम निर्णय अदालत का होता है।

✅ Article 227 के तहत हाई कोर्ट केवल गंभीर कानूनी त्रुटियों में ही हस्तक्षेप करेगा।


Case Details

Court: High Court of Judicature at Allahabad

Judge: Hon'ble Dr. Justice Yogendra Kumar Srivastava

Case Title: Udayveer Singh vs. Rent Tribunal and 2 Others

Case No.: Matters Under Article 227 No. 3845 of 2026

Judgment Date: 29 July 2026

Relevant Laws:

  • Article 227, Constitution of India
  • Section 21(2), Uttar Pradesh Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021
  • Section 35, Indian Stamp Act, 1899
  • Section 49, Registration Act, 1908

Final Result: Petition Dismissed.




Discussion Question

क्या आपको लगता है कि यदि मूल दस्तावेज़ उपलब्ध न हो तो केवल फोटोकॉपी के आधार पर फोरेंसिक जांच की अनुमति मिलनी चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें।

Friday, July 17, 2026

क्या 2021 के बाद मकान मालिक-किरायेदार के विवाद Small Causes Court में चल सकते हैं? इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

 

Judicial Samvad | प्रयागराज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मकान मालिक और किरायेदार (Landlord-Tenant) विवादों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई किरायेदारी विवाद उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 (U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021) लागू होने के बाद दायर किया गया है, तो उसकी सुनवाई सामान्यतः Small Causes Court (SCC Court) में नहीं बल्कि 2021 के अधिनियम के तहत गठित Rent Authority के समक्ष होगी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि मकान मालिक ने पहले Transfer of Property Act की धारा 106 के तहत नोटिस भेज दिया था, Small Causes Court का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) सुरक्षित नहीं रह जाता।




क्या था पूरा मामला?

हापुड़ स्थित दो दुकानों के संबंध में मकान मालिक ने किरायेदार को 15 जुलाई 2021 को धारा 106, Transfer of Property Act, 1882 के तहत किरायेदारी समाप्त करने का नोटिस भेजा।

इसके बाद 20 अगस्त 2021 को मकान मालिक ने किरायेदार के खिलाफ Small Causes Court, हापुड़ में बेदखली (Eviction), किराया बकाया और हर्जाना वसूलने का मुकदमा दायर किया।

मुकदमे के दौरान किरायेदार की मृत्यु हो गई और उसके कानूनी उत्तराधिकारियों (Legal Representatives) को पक्षकार बनाया गया।

उत्तराधिकारियों ने अदालत में आपत्ति उठाई कि—

  • जब मुकदमा दायर हुआ, तब तक U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021 लागू हो चुका था।
  • इसलिए इस विवाद की सुनवाई Small Causes Court नहीं बल्कि Rent Authority के समक्ष होनी चाहिए थी।

निचली अदालत ने क्या कहा?

Small Causes Court ने यह कहते हुए आपत्ति खारिज कर दी कि—

  • किरायेदारी पहले ही धारा 106 TPA के नोटिस से समाप्त हो चुकी थी।
  • इसलिए मुकदमा Small Causes Court में ही चल सकता है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत के इस दृष्टिकोण को कानूनी रूप से गलत बताया।

कोर्ट ने कहा कि—

किसी अदालत का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) यह देखकर तय होगा कि मुकदमा किस तारीख को दायर किया गया, न कि यह देखकर कि नोटिस कब भेजा गया था।

यदि मुकदमा 2021 के अधिनियम के लागू होने के बाद दायर हुआ है, और वह अधिनियम उस विवाद पर लागू होता है, तो मामला Rent Authority के समक्ष ही जाएगा।


धारा 106 TPA पर कोर्ट की अहम टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि—

Transfer of Property Act की धारा 106 केवल किरायेदारी समाप्त करने का कारण (Cause of Action) देती है।

लेकिन यह तय नहीं करती कि मुकदमे की सुनवाई किस अदालत में होगी।

यानी—

✔️ नोटिस देना एक अलग बात है।

✔️ मुकदमा किस अदालत में चलेगा, यह उस समय लागू कानून से तय होगा जब मुकदमा दायर किया गया।


Section 38, 2021 Act का क्या महत्व है?

हाई कोर्ट ने कहा कि Section 38(1) स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था करता है कि—

जहां 2021 का अधिनियम लागू होता है, वहां उससे संबंधित विवादों की सुनवाई विशेष रूप से Rent Authority करेगी।

ऐसी स्थिति में सामान्य दीवानी अदालतों तथा Small Causes Court का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो जाता है।


कोर्ट ने क्यों पलटा निचली अदालत का फैसला?

हाई कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने—

  • Jurisdiction और Cause of Action में अंतर नहीं समझा।
  • केवल धारा 106 TPA के नोटिस को आधार बनाकर मुकदमे को SCC Court में चलने योग्य मान लिया।
  • जबकि 2021 के नए कानून के लागू होने के बाद मंच (Forum) बदल चुका था।

इसलिए निचली अदालत का आदेश कानून के विपरीत था।


क्या मकान मालिक का दावा खत्म हो गया?

नहीं।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

मकान मालिक का अधिकार समाप्त नहीं हुआ है।

उन्हें स्वतंत्रता दी गई है कि वे U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021 के तहत सक्षम Rent Authority के समक्ष नया वाद दायर कर सकते हैं।


हाई कोर्ट का अंतिम फैसला

✔️ दोनों Revision स्वीकार कर ली गईं।

✔️ Small Causes Court, हापुड़ के आदेश रद्द कर दिए गए।

✔️ घोषित किया गया कि SCC Suit No. 3 of 2021 Small Causes Court में विचारणीय (Maintainable) नहीं है।

✔️ मकान मालिक को Rent Authority के समक्ष नया मामला दायर करने की स्वतंत्रता दी गई।


इस फैसले का कानूनी महत्व

✅ 2021 के बाद दायर किरायेदारी विवादों में अधिकार क्षेत्र नए Tenancy Act से तय होगा।

✅ धारा 106 TPA का नोटिस केवल Cause of Action देता है, Jurisdiction तय नहीं करता।

✅ Section 38, U.P. Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021 Rent Authority को विशेष अधिकार देता है।

✅ गलत मंच (Wrong Forum) में दायर मुकदमा आगे नहीं चल सकता।


Case Details

Court: High Court of Judicature at Allahabad

Judge: Hon'ble Dr. Justice Yogendra Kumar Srivastava

Case Titles:

  • Manoharlal (Deceased) & Others vs. Jagdish Prasad Goel (S.C.C. Revision No. 79 of 2025)
  • Manoharlal (Deceased) & Others vs. Jagdish Prasad Goel (S.C.C. Revision No. 51 of 2026)

Judgment Date: 15 July 2026

Relevant Laws:

  • Uttar Pradesh Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021
  • Section 38, U.P. Tenancy Act, 2021
  • Section 106, Transfer of Property Act, 1882
  • Order VII Rule 11, Code of Civil Procedure

Final Decision: दोनों SCC Revisions स्वीकार। Small Causes Court का अधिकार क्षेत्र समाप्त माना गया तथा मकान मालिक को Rent Authority के समक्ष उचित कार्यवाही करने की स्वतंत्रता दी गई।




Discussion Question

क्या आपको लगता है कि नए किरायेदारी कानून लागू होने के बाद सभी मकान मालिक-किरायेदार विवाद केवल Rent Authority के समक्ष ही सुने जाने चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें।

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