Judicial Samvad | प्रयागराज
यदि किसी विवादित दस्तावेज़ की केवल फोटोकॉपी उपलब्ध हो, तो क्या उसके हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच (Handwriting Expert Examination) कराई जा सकती है? इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मूल दस्तावेज़ (Original Document) के बिना केवल फोटोकॉपी के आधार पर हस्ताक्षरों की वैज्ञानिक जांच कराना सामान्यतः संभव नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय तभी विश्वसनीय हो सकती है, जब उसके सामने मूल दस्तावेज़ मौजूद हो। केवल फोटोकॉपी में वे सूक्ष्म विशेषताएं (Microscopic Features) नहीं होतीं, जिनके आधार पर वैज्ञानिक परीक्षण किया जाता है।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता का दावा था कि वर्ष 2005 में दुकान के संबंध में एक किरायानामा (Rent Agreement) हुआ था, जिसके आधार पर वह किरायेदार के रूप में दुकान पर कब्जे में है।
बाद में मकान मालिक की ओर से उत्तर प्रदेश शहरी परिसरों की किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के तहत बेदखली (Eviction) का मुकदमा दायर किया गया।
किरायेदार ने अपने बचाव में उस किरायानामे की फोटोकॉपी अदालत में पेश की और मांग की कि उस पर मौजूद हस्ताक्षरों की तुलना मृतक मकान मालिक के स्वीकारित हस्ताक्षरों से हैंडराइटिंग एक्सपर्ट द्वारा कराई जाए।
रेंट अथॉरिटी और रेंट ट्रिब्यूनल ने क्या कहा?
रेंट अथॉरिटी ने आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि—
- मूल किरायानामा उपलब्ध नहीं है।
- केवल फोटोकॉपी के आधार पर वैज्ञानिक जांच विश्वसनीय नहीं होगी।
- इसलिए हैंडराइटिंग एक्सपर्ट को भेजने का कोई औचित्य नहीं है।
रेंट ट्रिब्यूनल ने भी इसी निर्णय को सही माना और अपील खारिज कर दी।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों निचली अदालतों के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि—
- हैंडराइटिंग एक्सपर्ट केवल अक्षरों की आकृति नहीं देखता।
- वह Pen Pressure, Ink Flow, Stroke Formation, Line Quality, Natural Variations, Pen Lifts जैसी अनेक सूक्ष्म विशेषताओं का परीक्षण करता है।
- ये सभी विशेषताएं केवल Original Document में सुरक्षित रहती हैं।
- फोटोकॉपी में ये वैज्ञानिक विशेषताएं नष्ट हो जाती हैं या स्पष्ट नहीं रहतीं।
इसलिए केवल फोटोकॉपी के आधार पर विशेषज्ञ की राय विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बात कही
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विरोधी पक्ष ने कुछ तथ्यों को स्वीकार (Admission) भी किया हो, तब भी इससे किसी पक्ष को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि फोटोकॉपी को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा ही जाए।
वैज्ञानिक परीक्षण की पहली और अनिवार्य शर्त मूल दस्तावेज़ का उपलब्ध होना है।
क्या फोटोकॉपी कभी जांच के लिए भेजी जा सकती है?
हाई कोर्ट ने माना कि कुछ विशेष परिस्थितियों में स्पष्ट और उच्च गुणवत्ता वाली फोटोकॉपी पर विशेषज्ञ राय दी जा सकती है, लेकिन यह कोई सामान्य नियम नहीं है।
हर मामले में अदालत यह देखेगी कि उपलब्ध दस्तावेज़ वास्तव में विश्वसनीय वैज्ञानिक परीक्षण के योग्य है या नहीं।
Article 227 पर भी हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि Article 227 के तहत हाई कोर्ट की शक्ति केवल Supervisory Jurisdiction है।
हाई कोर्ट अपील की तरह साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं करता।
जब तक निचली अदालत का आदेश—
- अधिकार क्षेत्र से बाहर,
- स्पष्ट रूप से अवैध,
- मनमाना (Perverse),
- या न्याय में गंभीर विफलता पैदा करने वाला न हो,
तब तक हाई कोर्ट उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा।
कोर्ट का अंतिम फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि—
- मूल दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है।
- केवल फोटोकॉपी के आधार पर विशेषज्ञ जांच कराना उचित नहीं।
- रेंट अथॉरिटी और रेंट ट्रिब्यूनल का आदेश पूरी तरह कानूनी है।
इसलिए याचिका खारिज कर दी गई।
इस फैसले का कानूनी महत्व
✅ केवल फोटोकॉपी के आधार पर हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की जांच का अधिकार नहीं मिलता।
✅ वैज्ञानिक परीक्षण के लिए मूल दस्तावेज़ सबसे महत्वपूर्ण होता है।
✅ विशेषज्ञ की राय केवल सहायक साक्ष्य (Advisory Evidence) होती है, अंतिम निर्णय अदालत का होता है।
✅ Article 227 के तहत हाई कोर्ट केवल गंभीर कानूनी त्रुटियों में ही हस्तक्षेप करेगा।
Case Details
Court: High Court of Judicature at Allahabad
Judge: Hon'ble Dr. Justice Yogendra Kumar Srivastava
Case Title: Udayveer Singh vs. Rent Tribunal and 2 Others
Case No.: Matters Under Article 227 No. 3845 of 2026
Judgment Date: 29 July 2026
Relevant Laws:
- Article 227, Constitution of India
- Section 21(2), Uttar Pradesh Regulation of Urban Premises Tenancy Act, 2021
- Section 35, Indian Stamp Act, 1899
- Section 49, Registration Act, 1908
Final Result: Petition Dismissed.
Discussion Question
क्या आपको लगता है कि यदि मूल दस्तावेज़ उपलब्ध न हो तो केवल फोटोकॉपी के आधार पर फोरेंसिक जांच की अनुमति मिलनी चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें।
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