मुख्य बातें (Highlights):
दिशानिर्देशों का उल्लंघन: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण (Maintenance) मामलों में संपत्ति और देनदारियों का प्रकटीकरण हलफनामा केवल कागजी खानापूर्ति नहीं है।
ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य: न्यायालय ने कहा कि निचली अदालतों को पक्षों के पिछले 3 साल के बैंक स्टेटमेंट और वित्तीय दस्तावेज अनिवार्य रूप से रिकॉर्ड पर लेने चाहिए।
सख्त रुख: वास्तविक आय को जानबूझकर छिपाना न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास है, ऐसे मामलों में अदालतों को सतर्क रहकर कड़ी कार्रवाई करनी होगी।
पूरा मामला और कानूनी विवाद
यह मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष क्रिमिनल रिवीजन याचिकाओं (Criminal Revision No. 223 of 2024 व संबद्ध Criminal Revision No. 51 of 2024) के माध्यम से आया था। इस मामले में सीआरपीसी की धारा 125 (Section 125 CrPC) के तहत तय की गई भरण-पोषण की राशि को चुनौती दी गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पति ने अपनी वास्तविक आय और वित्तीय स्थिति को छुपाने के लिए जानबूझकर अपने बैंक स्टेटमेंट, आयकर रिटर्न (ITR) और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश नहीं किए थे और एक भ्रामक हलफनामा दायर किया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या
माननीय न्यायमूर्ति ने इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Rajnesh v. Neha (2021) के ऐतिहासिक फैसले में तय किए गए सिद्धांतों को दोहराते हुए निचली अदालतों की कार्यप्रणाली और पक्षकारों के रवैये पर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
1. 'Rajnesh v. Neha' के निर्देश मात्र औपचारिकता नहीं
हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए दिशानिर्देश और उनके तहत मांगा जाने वाला 'संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा' (Affidavit of Disclosure of Assets and Liabilities) कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है कि इसे जैसे-तैसे भर कर दे दिया जाए। इसका उद्देश्य कोर्ट के सामने दोनों पक्षों की वास्तविक वित्तीय स्थिति को स्पष्ट रूप से लाना है।
2. पिछले 3 वर्षों के बैंक स्टेटमेंट मंगाना ट्रायल कोर्ट का कर्तव्य
अदालत ने स्पष्ट रूप से अभिलिखित किया कि यह ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) का वैधानिक कर्तव्य है कि वह केवल हलफनामे पर भरोसा न करे, बल्कि सच्चाई का पता लगाने के लिए दोनों पक्षों से पिछले तीन वर्षों के बैंक स्टेटमेंट, वित्तीय रिकॉर्ड और अन्य आवश्यक दस्तावेज अनिवार्य रूप से रिकॉर्ड पर प्रस्तुत कराए।
3. आय छिपाना न्यायालय को भ्रमित करने का प्रयास
माननीय न्यायालय ने कहा कि आवश्यक वित्तीय दस्तावेजों का जानबूझकर प्रकटीकरण (Non-disclosure) न करना सीधे तौर पर न्यायालय को गुमराह और भ्रमित करने का एक दुर्भावनापूर्ण प्रयास है। ऐसे मामलों में अदालतों को मूकदर्शक नहीं बने रहना चाहिए।
4. अदालतों को सतर्क रहने और सख्त कदम उठाने की जरूरत
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि कोई पक्षकार गलत हलफनामा देता है या जानबूझकर तथ्य छुपाता है, तो न्यायालयों को पूरी तरह सतर्क (Vigilant) रहना चाहिए। अदालतें ऐसे मामलों में साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 (Section 106 Evidence Act) के तहत प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकती हैं और आईपीसी की धारा 191/193 (झूठे साक्ष्य देना) के तहत दंडात्मक कार्रवाई भी सुनिश्चित कर सकती हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय भरण-पोषण के मुकदमों में अपनी आय छुपाने वाले पतियों के लिए एक बड़ा झटका है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब केवल सैलरी स्लिप छुपाकर या कम आय दिखाकर गुजारा भत्ता से नहीं बचा जा सकता। इस आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों को भी भेजी गई है ताकि पूरे राज्य में Rajnesh v. Neha के नियमों का कड़ाई से पालन हो सके।
केस विवरण (Case Details)
केस का नाम: Smt Sadhana @ Shakshi And Another vs State Of U.P. And Another
न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (High Court of Judicature at Allahabad)
क्रिमिनल रिवीजन नंबर: Criminal Revision No. - 223 of 2024 (With Criminal Revision No. 51 of 2024)
फैसले की तारीख: 15 मई, 2026
न्यूट्रल सिटेशन नंबर: 2026:AHC:115457
श्रेणी: A.F.R. (Approved for Reporting)
याचिकाकर्ता के वकील: एस.पी.एस. चौहान, श्रीमती मीनाक्षी चौहान
विपक्षी दल के वकील: अभिनव सिंह, जी.ए., संतोष कुमार उपाध्याय, विनोद कुमार उपाध्याय