न्याय के इतिहास में तकनीक का इस्तेमाल हमेशा मददगार रहा है, लेकिन क्या हो जब देश की अदालतें ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के मतिभ्रम (Hallucination) का शिकार हो जाएं? सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा फैसला सुनाया है जो कानूनी जगत में AI के अंधाधुंध इस्तेमाल को लेकर एक बड़ी चेतावनी है।
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू एंड कश्मीर बैंक लिमिटेड (Civil Appeal No. 11950 of 2025) मामले में NCLT (राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण) और NCLAT के फैसलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। वजह जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे—NCLT ने अपने फैसले में ऐसे कोर्ट केस और पैराग्राफ्स का हवाला दिया था, जो असल दुनिया में वजूद ही नहीं रखते! वे पूरी तरह से AI द्वारा मनगढ़ंत और फर्जी (Hallucinated) थे।
🔍 क्या है पूरा मामला? (The Shocking Backstory)
लोन डिफॉल्ट और गारंटी: 'एसेल इन्फ्राप्रोजेक्ट्स लिमिटेड' (EIL) ने जम्मू एंड कश्मीर बैंक से लिए गए लोन के लिए कॉर्पोरेट गारंटी दी थी। लोन न चुकाने पर बैंक ने NCLT मुंबई में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया (Insolvency) शुरू करने की अर्जी दी।
NCLT का फैसला: NCLT ने याचिका स्वीकार कर ली। लेकिन अपने फैसले को सही ठहराने के लिए अदालत ने 6 ऐसे पुराने मुकदमों (Precedents) का जिक्र किया, जिनमें से कई साइटेशन (Citations) और पैराग्राफ पूरी तरह से फर्जी थे।
अपील और खुलासा: जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने अदालत का ध्यान इस तरफ खींचा कि NCLT के फैसले में इस्तेमाल किए गए कानूनी उदाहरण पूरी तरह नकली और शायद AI-जनरेटेड हैं।
📊 फर्जी फैसलों का कच्चा चिट्ठा (The Fake Precedents Table)
सुप्रीम कोर्ट की जांच में जो सामने आया, वह चौंकाने वाला था:
| कथित केस का नाम | कोर्ट की टिप्पणी | असलियत |
| State Bank of India v. M/s Shree Ram Urban Infrastructure Ltd. | गलत साइटेशन | असल केस का नाम कुछ और था और पैराग्राफ गायब था। |
| Everest Kento Cylinders Ltd. v. Union of India | सही साइटेशन, फर्जी कंटेंट | केस तो असली है, पर जो पैराग्राफ लिखा गया वो पूरी तरह नकली था। |
| ICICI Bank Ltd. v. Urban Infrastructure Real Estate Ltd. | पूरी तरह फर्जी | इस नाम का कोई फैसला कानून की किताबों में है ही नहीं। |
| V.S. Dempo & Co. Ltd. v. Reliance Communications Ltd. | पूरी तरह फर्जी | यह भी AI का एक काल्पनिक निर्माण था। |
⚖️ सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी: "यह न्याय के खून को चूसने जैसा है"
जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस लापरवाही पर बेहद सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा:
" province of law (कानून के दायरे) में AI द्वारा उत्पन्न फर्जी और काल्पनिक सामग्रियों का उपयोग करना, न्याय के क्षेत्र में 'मिथाइल आइसोसाइनेट' (भोपाल गैस त्रासदी वाली जहरीली गैस) को छोड़ने जैसा है। यह अदृश्य, कपटी और घातक है, जो न्यायिक प्रक्रिया के जीवन रक्त को ही दूषित कर देता है।"
🚫 कोर्ट के अहम निर्देश (Zero-Tolerance Policy)
शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance): बिना वेरिफिकेशन के AI-जनरेटेड फैसलों को कोर्ट में पेश करना वकीलों की तरफ से गंभीर कदाचार (Misconduct) है, और जजों द्वारा इस पर भरोसा करना एक बड़ी चूक है। ऐसा कोई भी फैसला कानून की नजर में अमान्य है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने BCI को एक कमेटी बनाने और ऐसे वकीलों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई के नियम तय करने का निर्देश दिया है जो बिना जांचे-परखे AI का कंटेंट कोर्ट में सौंप देते हैं।
ह्यूमन इन द लूप (Human in the Loop): अदालत ने साफ किया कि वे तकनीक के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन न्याय के हर चरण पर इंसानी दिमाग और नियंत्रण का होना अनिवार्य है। सोचने-समझने की क्षमता को AI के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
🌍 वैश्विक स्तर पर भी बजी खतरे की घंटी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ब्रिटेन (UK) के एक बड़े लॉ फर्म Pinsent Masons LLP का भी उदाहरण दिया, जहां 2026 में एक जूनियर वकील ने AI द्वारा तैयार की गई फर्जी वैधानिक धारा को बिना जांचे कोर्ट में पेश कर दिया था, जिसके बाद कोर्ट ने उन्हें कड़ी फटकार लगाई थी और मामला रेगुलेटर के पास गया था।
🔮 आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT के आदेशों को रद्द करते हुए मामले को दोबारा से सही और कानूनी तरीके से सुनने के लिए NCLT को वापस भेज दिया है और दो हफ्ते के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया है।
निष्कर्ष:
यह फैसला देश के सभी वकीलों, जजों और कानूनी शोधकर्ताओं के लिए एक सबक है। AI एक बेहतरीन टूल हो सकता है, लेकिन वह हमारे विवेक और कड़ी मेहनत का विकल्प कभी नहीं बन सकता। साधना और सत्य की खोज ही न्याय की असली नींव है।
क्या सोचने-समझने का काम भी अब रोबोट करेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि "अगर सोचने का काम तकनीक को सौंप दिया गया और यह आदत बन गई, तो इंसान सही-गलत का फर्क भूल जाएगा।" क्या आपको भी लगता है कि AI के बढ़ते इस्तेमाल से इंसानी दिमाग और विवेक कमजोर हो रहा है? अपनी राय कमेंट में बताएं।
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