Saturday, May 17, 2025

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: बिना तारीख, समय और पुख्ता सबूतों के पति पर 498A और दहेज उत्पीड़न का केस चलाना कानून का दुरुपयोग

 नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में धारा 498A (क्रूरता) और दहेज निषेध अधिनियम (DP Act) के बढ़ते दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी विशिष्ट तारीख, समय या घटना के विवरण के लगाए गए सामान्य और अस्पष्ट (Vague and Omnibus) आरोप आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बन सकते। ऐसा करना केवल पति और उसके परिवार को परेशान करने और कानून का दुरुपयोग करने जैसा है।

जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने आरोपी पति (राजेश चड्ढा) की सजा को रद्द करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।






क्या था मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के लखनऊ का है, जहाँ साल 1997 में राजेश चड्ढा और माला चड्ढा की शादी हुई थी। शादी के बाद पत्नी केवल कुछ ही समय अपने ससुराल में रही। साल 1999 में पति द्वारा तलाक की याचिका (Divorce Petition) दायर करने के बाद, पत्नी ने पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज कराई। आरोप था कि उसे ₹2 लाख के दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, लात-घूंसों से पीटा गया और गर्भावस्था के दौरान धक्का दिए जाने के कारण उसका गर्भपात (Miscarriage) हो गया।

ट्रायल कोर्ट ने मारपीट और गर्भपात के आरोपों को साबित न होने के कारण खारिज कर दिया था, लेकिन केवल पत्नी और उसके पिता के बयानों के आधार पर पति को धारा 498A (2 वर्ष की कैद) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 (1 वर्ष की कैद) के तहत दोषी ठहराया था। हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा था।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

  • बिना मेडिकल रिपोर्ट के गंभीर आरोप 'मनगढ़ंत': कोर्ट ने नोट किया कि पत्नी ने मारपीट और धक्का देने से हुए गर्भपात के इतने गंभीर आरोप लगाए, लेकिन रिकॉर्ड पर किसी भी अस्पताल या डॉक्टर की कोई मेडिकल रिपोर्ट या इंजरी सर्टिफिकेट (Injury Report) पेश नहीं किया गया।

  • तलाक के बाद 'काउंटर-ब्लास्ट' एफआईआर: कोर्ट ने पाया कि पति द्वारा फरवरी 1999 में तलाक का केस फाइल किए जाने के बाद, दिसंबर 1999 में यह एफआईआर दर्ज कराई गई थी। दोनों का तलाक पहले ही फाइनल हो चुका है। ऐसे में यह साफ है कि यह केस केवल दुर्भावना से प्रेरित था।

  • कानून के 'क्रूर दुरुपयोग' पर चिंता: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आजकल वैवाहिक विवादों में पति के दूर के रिश्तेदारों, बूढ़े माता-पिता और अलग रह रही बहनों को भी आरोपी बनाने की एक "बढ़ती प्रवृत्ति" (Growing Tendency) देखी जा रही है। यह सुरक्षात्मक कानूनों के वास्तविक उद्देश्य को ही खत्म कर देता है।

"क्रूरता (Cruelty) शब्द का खुद ही बहुत क्रूरता से दुरुपयोग किया जा रहा है। बिना किसी विशिष्ट तारीख, समय या घटना के विवरण के ऐसे गंभीर आरोप लगाना अभियोजन (Prosecution) के मामले को कमजोर करता है।" - सुप्रीम कोर्ट

न्यायालय ने कहा कि पति पिछले 20 से अधिक वर्षों से इस कानूनी मुकदमेबाजी को झेल रहा है। यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने पुनरीक्षण अधिकार (Revisionary Jurisdiction) का सही इस्तेमाल किया होता, तो पति के जीवन के कीमती वर्ष बर्बाद होने से बच सकते थे। शीर्ष अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए पति की सजा के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया।

केस से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां (Case Details)

  • न्यायालय: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (क्रिमिनल अपीलीय क्षेत्राधिकार)

  • जजमेंट की तारीख: 13 मई, 2025

  • साइटेशन: 2025 INSC 671

  • क्रिमिनल अपील संख्या: 2025 की क्रिमिनल अपील [SLP (Crl.) Nos. 2353-2354 of 2019 से उद्भूत]

  • पीठ (Bench): माननीय न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और माननीय न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा

  • अपीलकर्ता (Appellant): राजेश चड्ढा (Rajesh Chaddha)

  • प्रतिवादी (Respondent): उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (State of Uttar Pradesh)

  • मूल कानून/धाराएं: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A, 323, 506 और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 व 4।








पाठकों के लिए एक सवाल (महत्वपूर्ण चर्चा)

क्या आपको भी लगता है कि वैवाहिक विवादों में धारा 498A और दहेज उत्पीड़न के कानूनों का दुरुपयोग बढ़ रहा है, जिससे बेकसूर लोगों को सालों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं? इस मामले में कानूनी संतुलन बनाने के लिए आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार हमारे साथ जरूर साझा करें।



Wednesday, February 12, 2025

क्या हाईकोर्ट के फैसले को नजरअंदाज कर सकते हैं न्यायिक अधिकारी? सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा संदेश, अनुशासनिक कार्रवाई पर कही यह बात!

 नई दिल्ली: अधीनस्थ न्यायालयों (Subordinate Courts) के न्यायिक अधिकारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था दोहराई है। 'प्रभा शर्मा बनाम सुनील गोयल' मामले में फैसला सुनाते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ किया है कि देश के सभी न्यायिक अधिकारी अपने से उच्च न्यायालयों (High Courts) के फैसलों को मानने के लिए पूरी तरह बाध्य हैं. इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट और संविधान के महत्व को रेखांकित करते हुए अदालत ने कानून के शासन को सर्वोपरि बताया है.





क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक न्यायिक अधिकारी (अपीलकर्ता प्रभा शर्मा) से जुड़ा है, जो हाईकोर्ट के एक फैसले में उनके खिलाफ की गई कुछ टिप्पणियों से व्यथित थीं. अपीलकर्ता का मानना था कि हाईकोर्ट के फैसले में की गई टिप्पणियां उनके करियर और छवि के खिलाफ (Adverse) थीं, इसलिए उन्होंने उन टिप्पणियों को हटाने (Expunge) के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

न्यायिक अधिकारी की ओर से कोर्ट को यह भी बताया गया कि हाईकोर्ट के उसी फैसले के आधार पर उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Proceedings) भी शुरू कर दी गई है.

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख और संदेश

जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस ए.एम. खानविलकर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अपीलकर्ता की मांग को खारिज कर दिया और निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:

  • हाईकोर्ट के फैसले सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में केवल स्थापित कानूनी स्थिति को ही बयां किया है। अदालत ने कड़े शब्दों में याद दिलाया कि सभी न्यायिक अधिकारी अपने संबंधित हाईकोर्ट के निर्णयों का पालन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं।

  • अनुच्छेद 141 का हवाला: पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 141 का जिक्र करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश के भीतर सभी अदालतों पर बाध्यकारी है और न्यायिक अधिकारियों को इसकी मर्यादा बनाए रखनी होगी।

  • ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं: शीर्ष अदालत ने पाया कि हाईकोर्ट के फैसले में ऐसी कोई भी टिप्पणी नहीं है जो अपीलकर्ता की ईमानदारी या निष्ठा (Integrity) पर कोई सवाल उठाती हो, इसलिए उन टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

विभागीय जांच को लेकर निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को निर्देश देते हुए कहा कि वह न्यायिक अधिकारी के खिलाफ चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही को आगे बढ़ाने और स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि हाईकोर्ट इस जांच के दौरान अपने पुराने फैसले में की गई टिप्पणियों से प्रभावित (Uninfluenced) न हो और स्वतंत्र रूप से फैसला करे। मामला काफी पुराना होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुशासनात्मक कार्यवाही को जल्द से जल्द (Expeditiously) पूरा करने का भी अनुरोध किया है।

केस से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां (Case Details)

  • न्यायालय: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (नागरिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)

  • जजमेंट की तारीख: 17 जनवरी, 2017

  • सिविल अपील संख्या: 2017 की सिविल अपील संख्या 632-633

  • पीठ (Bench): माननीय न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और माननीय न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर

  • अपीलकर्ता (Appellant): प्रभा शर्मा (Prabha Sharma)

  • प्रतिवादी (Respondents): सुनील गोयल एवं अन्य (Sunil Goyal & Ors.)

  • संबद्ध कानून: भारत के संविधान का अनुच्छेद 141






पाठकों के लिए एक सवाल (महत्वपूर्ण चर्चा)

क्या आपको लगता है कि निचली अदालतों के कुछ न्यायिक अधिकारियों द्वारा हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानूनी सिद्धांतों (Precedents) को नजरअंदाज करना न्याय प्रणाली में देरी का एक बड़ा कारण है? इस पर लगाम लगाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें।

Sunday, March 10, 2024

⚖️ "चलाकी से तैयार की गई ड्राफ्टिंग" से मुकदमों का दुरुपयोग नहीं हो सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट

 कर्नाटक उच्च न्यायालय ने श्रीमती डी. एन. भाग्या बनाम श्री डी. ए. मल्लिकार्जुन (4 मार्च, 2024) के मामले में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है, जो नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 (Order VII Rule 11) के तहत 'वाद पत्र की अस्वीकृति' (Rejection of Plaint) और अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग पर कड़ा रुख स्पष्ट करती है.




📝 मामले की पृष्ठभूमि (Background)

  • विवाद की जड़: वादियों (प्रतिवादियों 1 से 6) ने एक दीवानी मुकदमे (O.S. No. 1/2010) में खुद को एक संपत्ति का पूर्ण स्वामी घोषित करने और एक पंजीकृत सेल डीड को रद्द करने की मांग की थी.

  • दावे का आधार: उनका दावा इस बात पर निर्भर था कि उनके पिता (अप्पजप्पा) संपत्ति के मूल मालिकों (चिक्कबसप्पा और नंजम्मा) के दत्तक पुत्र (Adopted Son) थे.

  • छिपाया गया तथ्य: वादियों ने अपने वाद पत्र में चालाकी से यह छिपा लिया कि पूर्व के दो मुकदमों (O.S. No. 90/1960 और O.S. No. 46/1993) में अदालतें पहले ही यह फैसला सुना चुकी थीं कि उनके पिता वैध रूप से दत्तक पुत्र नहीं थे.

🔍 कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां एवं कानूनी सिद्धांत

1. महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना = वाद का कोई कारण न होना (No Cause of Action): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि CPC के आदेश 6 नियम 2(1) के तहत सभी महत्वपूर्ण तथ्यों (Material Facts) का खुलासा करना अनिवार्य है। जब दावा ही एक ऐसी गोद लेने की प्रक्रिया (Adoption) पर टिका हो जिसे अदालत पहले ही खारिज कर चुकी है, तो मुकदमे के लिए कोई वैध 'कॉज ऑफ एक्शन' बचता ही नहीं है

2. "चलाकी से की गई ड्राफ्टिंग" (Clever Drafting): सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले टी. अरविंदनम (1977) का हवाला देते हुए माननीय न्यायमूर्ति हेमंत चंदनगौड़र ने कहा कि:

"यदि चलाकी भरी ड्राफ्टिंग के जरिए वाद के कारण (Cause of Action) का भ्रम पैदा किया गया है, तो अदालत को पहली ही सुनवाई में इसे कली में ही कुचल देना चाहिए (Nip it in the bud)।"

3. आंशिक राहत का तर्क खारिज: वादियों का तर्क था कि भले ही घोषणा (Declaration) का दावा टिकने योग्य न हो, लेकिन कब्जे के आधार पर स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) का मुकदमा चलाया जा सकता है। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि खाली भूमि के मामले में "कब्जा शीर्षक (Title) के पीछे चलता है"। जब मुख्य आधार ही गायब है, तो मुकदमा जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा

🏛️ न्यायालय का अंतिम निर्णय (The Verdict)

कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को पलटते हुए सिविल रिवीज़न पिटीशन को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने आदेश VII नियम 11(a) के तहत वादियों के वाद पत्र (Plaint) को पूरी तरह से खारिज कर दिया

💡 वकीलों और वादियों के लिए मुख्य सीख (Key Takeaways):

  • पारदर्शिता जरूरी है: अपने मुकदमों में पूर्व के प्रतिकूल आदेशों या प्रतिकूल निर्णयों को कभी न छिपाएं। छुपाया गया एक भी महत्वपूर्ण तथ्य आपके पूरे मुकदमे को खारिज करा सकता है

  • अदालतें सक्रिय हैं: न्यायपालिका अब केवल औपचारिक रूप से वादों को स्वीकार नहीं करेगी; फर्जी, परेशान करने वाले और बार-बार लाए जाने वाले मुकदमों को शुरुआती दौर में ही 'शूट डाउन' कर दिया जाएगा

⚖️ बेंच: माननीय न्यायमूर्ति हेमंत चंदनगौड़र

📅 निर्णय तिथि: 4 मार्च, 2024

📌 केस नंबर: CRP No. 60 of 2018 (Karnataka HC)




Monday, January 22, 2024

⚖️ "न्याय का मंदिर बच्चों का खेल का मैदान नहीं!" — सुप्रीम कोर्ट की मुकदमों में धोखाधड़ी करने वालों को कड़ी चेतावनी!

 

Topic: "TAINTED HANDS, NO RELIEF!" — सुप्रीम कोर्ट का बेल मामलों पर ऐतिहासिक निर्देश: तथ्यों को छुपाना अब पड़ेगा भारी!

Introduction: क्या कोई वादी (litigant) एक ही समय में सुप्रीम कोर्ट में जमानत (Bail) की गुहार लगाते हुए, उसी मामले में हाई कोर्ट से भी चोरी-छिपे बेल ले सकता है? Hon'ble Supreme Court of India ने Kusha Duruka V. The State of Odisha (Criminal Appeal No. 303 of 2024) मामले में इस तरह की चालाकी और 'अदालत से आंख-मिचौली' खेलने की प्रवृत्ति पर कड़ा प्रहार किया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने साफ कहा कि न्याय की धारा को प्रदूषित करने वाले किसी भी व्यक्ति को कोई राहत नहीं मिलेगी!




🔍 क्या था पूरा मामला? (The Shocking Facts)

इस केस में आरोपी (Kusha Duruka) के पास से 23.8 किलोग्राम गांजा बरामद हुआ था, जिसके बाद उसे NDPS एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया

  • आरोपी ने उड़ीसा हाई कोर्ट द्वारा पहली बेल रिजेक्ट होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में SLP दाखिल की

  • सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नोटिस भी जारी कर दिया

  • लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट में मामला पेंडिंग होने के दौरान ही, आरोपी ने हाई कोर्ट में दूसरी बेल एप्लीकेशन लगा दी और सुप्रीम कोर्ट वाली बात पूरी तरह छुपा ली!

  • नतीजा? हाई कोर्ट ने उसे बेल दे दी, जबकि हाई कोर्ट को यह भनक तक नहीं थी कि मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में पहले से चल रहा है

जब सुप्रीम कोर्ट के सामने यह बात आई, तो अदालत ने इस पर सख्त नाराजगी जताई और कहा कि "यह न्याय के प्रशासन को दूषित करने का एक और प्रयास है।"

💡 सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां: "सत्य ही न्याय की बुनियाद है"

सुप्रीम कोर्ट ने पुराने ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए समाज में गिरते नैतिक मूल्यों पर गहरी चिंता व्यक्त की:

  1. Moti Lal Songara केस का हवाला: "अदालत कोई प्रयोगशाला (laboratory) नहीं है जहाँ बच्चे खेलने आते हैं।" तथ्यों को छुपाना (Suppression of truth) सीधे तौर पर अदालत के साथ धोखाधड़ी है

  2. "Satya" और "Ahinsa": कोर्ट ने कहा कि आज़ादी से पहले सत्य न्याय प्रणाली का अभिन्न अंग था, लेकिन आज भौतिकवाद (materialism) के कारण लोग निजी फायदे के लिए झूठ और हेरफेर का सहारा लेने से नहीं हिचकिचाते

  3. Tainted Hands: जो व्यक्ति अदालत में 'गंदे हाथों' (tainted hands) के साथ आता है या तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है, वह किसी भी अंतरिम या अंतिम राहत का हकदार नहीं है

🛠️ सुप्रीम कोर्ट के 4 नए और अनिवार्य निर्देश (Mandatory Guidelines for Bail)

भविष्य में ऐसी विसंगतियों और धोखाधड़ी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी अदालतों के लिए Streamline Guidelines जारी की हैं:

क्र.सं.पक्षकार / विभागअनिवार्य नियम व निर्देश PDF
1याचिकाकर्ता (Petitioner)

बेल एप्लीकेशन में पहले की सभी तयशुदा या पेंडिंग बेल याचिकाओं (चाहे लोअर कोर्ट हो, हाई कोर्ट हो या सुप्रीम कोर्ट) का पूरा विवरण और आदेश की कॉपियां देना अनिवार्य होगा। आवेदन के शीर्ष पर स्पष्ट लिखना होगा कि यह कौन सी (First, Second, Third आदि) बेल एप्लीकेशन है

2अदालत की रजिस्ट्री (Registry)

सिस्टम जनरेटेड रिपोर्ट संलग्न करेगी, जिसमें उस अपराध (CNR नंबर या FIR) से जुड़ी सभी पिछली या पेंडिंग बेल याचिकाओं का पूरा ब्योरा होगा

3जांच अधिकारी (Investigating Officer)

यह आई.ओ. और सरकारी वकील (State Counsel) की जिम्मेदारी होगी कि वे अदालत को मामले से जुड़े सभी पिछले आदेशों और अदालती कार्यवाहियों से पूरी तरह अवगत कराएं

4एक ही जज के पास सुनवाई

एक ही FIR से उत्पन्न होने वाली सभी सह-आरोपियों की या बार-बार आने वाली बेल एप्लीकेशन एक ही माननीय जज के सामने लिस्ट होंगी (जब तक कि वह जज रिटायर, ट्रांसफर या उपलब्ध न हों), ताकि विरोधाभासी आदेशों से बचा जा सके

⚖️ फैसले का नतीजा (The Verdict)

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के आचरण को देखते हुए उसकी बेल कैंसिल करने का विकल्प होने के बावजूद, बेहद नरम रुख अपनाते हुए बेल तो रद्द नहीं की, लेकिन याचिका को निष्प्रभावी (Infructuous) मानकर खारिज कर दिया। साथ ही, अदालत का समय बर्बाद करने और चालाकी दिखाने के लिए आरोपी पर ₹10,000 का जुर्माना (Token Cost) लगाया

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश की कॉपी देश के सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया है ताकि पूरे देश की न्यायिक प्रणाली में सुधार किया जा सके

✍️ निष्कर्ष:

यह ऐतिहासिक फैसला वकीलों और वादियों दोनों के लिए एक बड़ा सबक है। कानून की पैरवी का मतलब चालाकी या तथ्यों को छुपाना नहीं है। अदालतों के सामने हमेशा 'साफ दिल और साफ हाथों' से आना चाहिए।

CASE DETAILS (For Legal Reference):

  • Case Title: Kusha Duruka v. The State of Odisha

  • Case Number: Criminal Appeal No. 303 of 2024 (Arising out of S.L.P. (Crl.) No. 12301 of 2023)

  • Court: Hon'ble Supreme Court of India (Criminal Appellate Jurisdiction)

  • Coram / Bench: Hon'ble Mr. Justice Vikram Nath and Hon'ble Mr. Justice Rajesh Bindal

  • Date of Judgment: 19 January 2024

  • Relevant Act/Section: Section 20(b)(ii) (C) of the Narcotic Drugs and Psychotropic Substances (NDPS) Act, 1985





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