नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में धारा 498A (क्रूरता) और दहेज निषेध अधिनियम (DP Act) के बढ़ते दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी विशिष्ट तारीख, समय या घटना के विवरण के लगाए गए सामान्य और अस्पष्ट (Vague and Omnibus) आरोप आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बन सकते। ऐसा करना केवल पति और उसके परिवार को परेशान करने और कानून का दुरुपयोग करने जैसा है।
जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने आरोपी पति (राजेश चड्ढा) की सजा को रद्द करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।
क्या था मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश के लखनऊ का है, जहाँ साल 1997 में राजेश चड्ढा और माला चड्ढा की शादी हुई थी। शादी के बाद पत्नी केवल कुछ ही समय अपने ससुराल में रही। साल 1999 में पति द्वारा तलाक की याचिका (Divorce Petition) दायर करने के बाद, पत्नी ने पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज कराई। आरोप था कि उसे ₹2 लाख के दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, लात-घूंसों से पीटा गया और गर्भावस्था के दौरान धक्का दिए जाने के कारण उसका गर्भपात (Miscarriage) हो गया।
ट्रायल कोर्ट ने मारपीट और गर्भपात के आरोपों को साबित न होने के कारण खारिज कर दिया था, लेकिन केवल पत्नी और उसके पिता के बयानों के आधार पर पति को धारा 498A (2 वर्ष की कैद) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 (1 वर्ष की कैद) के तहत दोषी ठहराया था। हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां:
बिना मेडिकल रिपोर्ट के गंभीर आरोप 'मनगढ़ंत': कोर्ट ने नोट किया कि पत्नी ने मारपीट और धक्का देने से हुए गर्भपात के इतने गंभीर आरोप लगाए, लेकिन रिकॉर्ड पर किसी भी अस्पताल या डॉक्टर की कोई मेडिकल रिपोर्ट या इंजरी सर्टिफिकेट (Injury Report) पेश नहीं किया गया।
तलाक के बाद 'काउंटर-ब्लास्ट' एफआईआर: कोर्ट ने पाया कि पति द्वारा फरवरी 1999 में तलाक का केस फाइल किए जाने के बाद, दिसंबर 1999 में यह एफआईआर दर्ज कराई गई थी। दोनों का तलाक पहले ही फाइनल हो चुका है। ऐसे में यह साफ है कि यह केस केवल दुर्भावना से प्रेरित था।
कानून के 'क्रूर दुरुपयोग' पर चिंता: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आजकल वैवाहिक विवादों में पति के दूर के रिश्तेदारों, बूढ़े माता-पिता और अलग रह रही बहनों को भी आरोपी बनाने की एक "बढ़ती प्रवृत्ति" (Growing Tendency) देखी जा रही है। यह सुरक्षात्मक कानूनों के वास्तविक उद्देश्य को ही खत्म कर देता है।
"क्रूरता (Cruelty) शब्द का खुद ही बहुत क्रूरता से दुरुपयोग किया जा रहा है। बिना किसी विशिष्ट तारीख, समय या घटना के विवरण के ऐसे गंभीर आरोप लगाना अभियोजन (Prosecution) के मामले को कमजोर करता है।" - सुप्रीम कोर्ट
न्यायालय ने कहा कि पति पिछले 20 से अधिक वर्षों से इस कानूनी मुकदमेबाजी को झेल रहा है। यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने पुनरीक्षण अधिकार (Revisionary Jurisdiction) का सही इस्तेमाल किया होता, तो पति के जीवन के कीमती वर्ष बर्बाद होने से बच सकते थे। शीर्ष अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए पति की सजा के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
केस से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां (Case Details)
न्यायालय: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (क्रिमिनल अपीलीय क्षेत्राधिकार)
जजमेंट की तारीख: 13 मई, 2025
साइटेशन: 2025 INSC 671
क्रिमिनल अपील संख्या: 2025 की क्रिमिनल अपील [SLP (Crl.) Nos. 2353-2354 of 2019 से उद्भूत]
पीठ (Bench): माननीय न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और माननीय न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा
अपीलकर्ता (Appellant): राजेश चड्ढा (Rajesh Chaddha)
प्रतिवादी (Respondent): उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (State of Uttar Pradesh)
मूल कानून/धाराएं: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A, 323, 506 और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 व 4।
पाठकों के लिए एक सवाल (महत्वपूर्ण चर्चा)
क्या आपको भी लगता है कि वैवाहिक विवादों में धारा 498A और दहेज उत्पीड़न के कानूनों का दुरुपयोग बढ़ रहा है, जिससे बेकसूर लोगों को सालों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं? इस मामले में कानूनी संतुलन बनाने के लिए आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार हमारे साथ जरूर साझा करें।