नई दिल्ली: अधीनस्थ न्यायालयों (Subordinate Courts) के न्यायिक अधिकारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था दोहराई है। 'प्रभा शर्मा बनाम सुनील गोयल' मामले में फैसला सुनाते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ किया है कि देश के सभी न्यायिक अधिकारी अपने से उच्च न्यायालयों (High Courts) के फैसलों को मानने के लिए पूरी तरह बाध्य हैं. इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट और संविधान के महत्व को रेखांकित करते हुए अदालत ने कानून के शासन को सर्वोपरि बताया है.
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक न्यायिक अधिकारी (अपीलकर्ता प्रभा शर्मा) से जुड़ा है, जो हाईकोर्ट के एक फैसले में उनके खिलाफ की गई कुछ टिप्पणियों से व्यथित थीं. अपीलकर्ता का मानना था कि हाईकोर्ट के फैसले में की गई टिप्पणियां उनके करियर और छवि के खिलाफ (Adverse) थीं, इसलिए उन्होंने उन टिप्पणियों को हटाने (Expunge) के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
न्यायिक अधिकारी की ओर से कोर्ट को यह भी बताया गया कि हाईकोर्ट के उसी फैसले के आधार पर उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही (Disciplinary Proceedings) भी शुरू कर दी गई है.
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख और संदेश
जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस ए.एम. खानविलकर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अपीलकर्ता की मांग को खारिज कर दिया और निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:
हाईकोर्ट के फैसले सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में केवल स्थापित कानूनी स्थिति को ही बयां किया है। अदालत ने कड़े शब्दों में याद दिलाया कि सभी न्यायिक अधिकारी अपने संबंधित हाईकोर्ट के निर्णयों का पालन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं।
अनुच्छेद 141 का हवाला: पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 141 का जिक्र करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश के भीतर सभी अदालतों पर बाध्यकारी है और न्यायिक अधिकारियों को इसकी मर्यादा बनाए रखनी होगी।
ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं: शीर्ष अदालत ने पाया कि हाईकोर्ट के फैसले में ऐसी कोई भी टिप्पणी नहीं है जो अपीलकर्ता की ईमानदारी या निष्ठा (Integrity) पर कोई सवाल उठाती हो, इसलिए उन टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
विभागीय जांच को लेकर निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को निर्देश देते हुए कहा कि वह न्यायिक अधिकारी के खिलाफ चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही को आगे बढ़ाने और स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि हाईकोर्ट इस जांच के दौरान अपने पुराने फैसले में की गई टिप्पणियों से प्रभावित (Uninfluenced) न हो और स्वतंत्र रूप से फैसला करे। मामला काफी पुराना होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुशासनात्मक कार्यवाही को जल्द से जल्द (Expeditiously) पूरा करने का भी अनुरोध किया है।
केस से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां (Case Details)
न्यायालय: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (नागरिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
जजमेंट की तारीख: 17 जनवरी, 2017
सिविल अपील संख्या: 2017 की सिविल अपील संख्या 632-633
पीठ (Bench): माननीय न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और माननीय न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर
अपीलकर्ता (Appellant): प्रभा शर्मा (Prabha Sharma)
प्रतिवादी (Respondents): सुनील गोयल एवं अन्य (Sunil Goyal & Ors.)
संबद्ध कानून: भारत के संविधान का अनुच्छेद 141
पाठकों के लिए एक सवाल (महत्वपूर्ण चर्चा)
क्या आपको लगता है कि निचली अदालतों के कुछ न्यायिक अधिकारियों द्वारा हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानूनी सिद्धांतों (Precedents) को नजरअंदाज करना न्याय प्रणाली में देरी का एक बड़ा कारण है? इस पर लगाम लगाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें।
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