Tuesday, September 26, 2023

⚖️ SC Landmark Judgement: क्या रजिस्ट्री की सर्टिफाइड कॉपी (Certified Copy) कोर्ट में सबूत के तौर पर मान्य है?

 सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने Appaiya v. Andimuthu @ Thangapandi (2023 INSC 835) के मामले में संपत्ति विवाद और एविडेंस एक्ट (Evidence Act) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया है।

अगर आप कानून के छात्र हैं, वकील हैं, या जमीन-जायदाद के मामलों में रुचि रखते हैं, तो यह जजमेंट आपके लिए बेहद जरूरी है।




 मुख्य विवाद क्या था? (The Dispute)

  • मामला: यह विवाद तमिलनाडु के मदुरै जिले की 2 एकड़ 61 सेंट जमीन के मालिकाना हक (Title & Possession) को लेकर था।

  • निचली अदालतों का फैसला: ट्रायल कोर्ट और फर्स्ट अपीलेट कोर्ट ने वादी (Plaintiff-Appaiya) के पक्ष में फैसला सुनाया था कि पूरी जमीन पर उनका मालिकाना हक है।

  • हाईकोर्ट का यू-टर्न: मद्रास हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट का तर्क था कि चूंकि वादी ने साल 1928 की मूल सेल डीड (Original Sale Deed) पेश नहीं की, बल्कि उसकी रजिस्ट्री ऑफिस से जारी सर्टिफाइड कॉपी (Certified Copy) पेश की है, इसलिए इसे मुख्य सबूत नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने वादी का दावा 2.61 एकड़ से घटाकर सिर्फ 96 सेंट कर दिया।

 सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? (The SC Ruling)

जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस सी.टी. रविकumar की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए निचली अदालतों के आदेश को बहाल रखा। कोर्ट ने सबूतों की स्वीकार्यता (Admissibility of Evidence) पर कुछ बड़े कानून स्पष्ट किए:

1) सर्टिफाइड कॉपी वैध सेकेंडरी एविडेंस (Secondary Evidence) है

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एविडेंस एक्ट की धारा 65(e) और 74(2) के तहत, उप-पंजीयक (Sub-Registrar) कार्यालय में रखी गई पंजीकृत विलेख (Registered Deed) की मूल प्रति एक 'सार्वजनिक दस्तावेज' (Public Document) की श्रेणी में आती है। इसलिए, इसकी प्रमाणित प्रति (Certified Copy) कोर्ट में सेकेंडरी एविडेंस के रूप में पूरी तरह स्वीकार्य है।

2) रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 57(5) का महत्व

कोर्ट ने रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 57(5) का हवाला देते हुए कहा कि रजिस्ट्री अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित और सील की गई कॉपियां मूल दस्तावेज केContents (सामग्री) को साबित करने के लिए पूरी तरह कानूनी रूप से मान्य हैं। इसके लिए किसी स्वतंत्र गवाह (Independent Witness) को बुलाकर साबित करने की आवश्यकता नहीं है, खासकर तब जब सामने वाले पक्ष ने दस्तावेज के निष्पादन (Execution) पर सीधा विवाद न उठाया हो।

3) सेकेंड अपील (Section 100 CPC) की सीमाएं

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को याद दिलाया कि CPC की धारा 100 के तहत 'सेकेंड अपील' में जब तक कोई गंभीर कानूनी त्रुटि (Perversity) या ठोस कानूनी सवाल (Substantial Question of Law) न हो, तब तक निचली अदालतों के तथ्यों (Concurrent Findings of Facts) को नहीं पलटना चाहिए।

 इस फैसले का आम जनता और वकीलों के लिए क्या मतलब है?

अक्सर सालों पुराने जमीन के मुकदमों में मूल दस्तावेज (Original Papers) खो जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में यह जजमेंट एक सुरक्षा कवच की तरह है। अब यह पूरी तरह साफ है कि अगर आपके पास मूल दस्तावेज नहीं भी है, तो रजिस्ट्री ऑफिस की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) कानूनन उतनी ही मजबूत है और मालिकाना हक साबित करने के लिए पर्याप्त है


केस साइटेशन: Appaiya Versus Andimuthu @ Thangapandi & Ors. (Civil Appeal No. 14630 of 2015)






आपके लिए एक सवाल (Question for You)

मान लीजिए, मोहन ने सोहन के खिलाफ जमीन के मालिकाना हक का एक मुकदमा दायर किया। मोहन के पास साल 1950 की मूल रजिस्ट्री (Original Deed) नहीं है, लेकिन उसने सब-रजिस्ट्रार ऑफिस से प्रमाणित प्रति (Certified Copy) निकालकर कोर्ट में पेश कर दी। सोहन का कहना है कि जब तक मोहन असली कागज़ नहीं लाएगा, तब तक कोर्ट इस कॉपी को सबूत नहीं मान सकती।

सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले (3892_2015_16_1501_47105_Judgement_20-Sep-2023.pdf) के आलोक में बताएं:

  1. क्या सोहन का तर्क कानूनी रूप से सही है?

  2. क्या कोर्ट मोहन द्वारा पेश की गई सर्टिफाइड कॉपी के आधार पर फैसला सुना सकती है?

अपना जवाब नीचे कमेंट बॉक्स में दें और बताएं कि क्या आपने भी कभी ऐसी स्थिति का सामना किया है

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